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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग धनाश्री २७(गायन समय दिन ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४३० - (गुजराती) *काल चेतावनी* । प्रतिताल
काल काया गढ़ भेलसी,
४३० - (गुजराती) *काल चेतावनी* । प्रतिताल
काल काया गढ़ भेलसी,
छीजे दशों दुवारो रे ।
देखतड़ाँ ते लूटिये,
देखतड़ाँ ते लूटिये,
होसी हाहाकारो रे ॥टेक॥
नाइक नगर न मीलसी,
नाइक नगर न मीलसी,
एकलड़ो ते जाई रे ।
संग न साथी कोई न आसी,
संग न साथी कोई न आसी,
तहं को जाणे किम थाई रे ॥१॥
सत जत साधो माहरा भाईड़ा,
सत जत साधो माहरा भाईड़ा,
काँई सुकृत लीजे सारो रे ।
मारग विषम चालिबो,
मारग विषम चालिबो,
काँई लीजे प्राण अधारो रे ॥२॥
जिमि नीर निवाणा१ ठाहरे,
जिमि नीर निवाणा१ ठाहरे,
तिमि साजी बांधो पालो रे ।
समर्थ सोई सेविये,
समर्थ सोई सेविये,
तो काया न लागे कालो रे ॥३॥
दादू मन घर आँणिये,
दादू मन घर आँणिये,
तो निहचल थिर थाये रे ।
प्राणी ने पूरो मिलो,
प्राणी ने पूरो मिलो,
तो काया न मेल्ही जाये रे ॥४॥
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काल से सावधान कर रहे हैं - काल काया - किले को नष्ट करेगा । दो नेत्र, दो श्रवण, दो नाक, मल - मूत्रेन्द्रियां, मुख और ब्रह्म - रँध्र, ये दशों द्वार क्षीण होंगे । देखते २ ही आयु - धन को काल लूट ले जायगा तब हाहाकार होगा ।
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काया नगर के स्वामी जीवात्मा को भी नगर में न रहने देगा, वह कर्मानुसार अकेला ही परलोक को जायगा । परलोक में उसके साथ कोई भी उसका साथी बन कर न जायगा । वहां कौन जानता है क्या होगा ?
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हे मेरे भाइयो ! सत्य तथा ब्रह्मचर्य पूर्वक कुछ तो सुकृत - सार रूप साधन करो । कठिन मार्ग में चलना है, कुछ प्राणों का आश्रय अवश्य अपनाओ ।
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जैसे नीची - भूमि१ में जल ठहरता है, वैसे ही तुम भी सँयमादि साधन सज कर भजन का बाँध बाँधो तो मन रूप जल ठहरेगा । फिर उस समर्थ प्रभु की भक्ति करोगे, तब काया के काल न लगेगा अर्थात् सूक्ष्म शरीर को काल पकड़ कर न ले जा सकेगा ।
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यदि मन को स्थिर करोगे तो वह निश्चल ब्रह्म में स्थिर हो जायगा । प्राणी को पूर्ण ब्रह्म मिलने पर उसका सूक्ष्म शरीर सँसार में नहीं रहता । जैसे उसकी आत्मा ब्रह्म में लय हो जाती है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर के इन्द्रियादि भी अपने २ कारण में मिल जाते हैं । ("सँत जन साधो” पाठान्तर भी है ।)
(क्रमशः)
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काल से सावधान कर रहे हैं - काल काया - किले को नष्ट करेगा । दो नेत्र, दो श्रवण, दो नाक, मल - मूत्रेन्द्रियां, मुख और ब्रह्म - रँध्र, ये दशों द्वार क्षीण होंगे । देखते २ ही आयु - धन को काल लूट ले जायगा तब हाहाकार होगा ।
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काया नगर के स्वामी जीवात्मा को भी नगर में न रहने देगा, वह कर्मानुसार अकेला ही परलोक को जायगा । परलोक में उसके साथ कोई भी उसका साथी बन कर न जायगा । वहां कौन जानता है क्या होगा ?
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हे मेरे भाइयो ! सत्य तथा ब्रह्मचर्य पूर्वक कुछ तो सुकृत - सार रूप साधन करो । कठिन मार्ग में चलना है, कुछ प्राणों का आश्रय अवश्य अपनाओ ।
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जैसे नीची - भूमि१ में जल ठहरता है, वैसे ही तुम भी सँयमादि साधन सज कर भजन का बाँध बाँधो तो मन रूप जल ठहरेगा । फिर उस समर्थ प्रभु की भक्ति करोगे, तब काया के काल न लगेगा अर्थात् सूक्ष्म शरीर को काल पकड़ कर न ले जा सकेगा ।
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यदि मन को स्थिर करोगे तो वह निश्चल ब्रह्म में स्थिर हो जायगा । प्राणी को पूर्ण ब्रह्म मिलने पर उसका सूक्ष्म शरीर सँसार में नहीं रहता । जैसे उसकी आत्मा ब्रह्म में लय हो जाती है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर के इन्द्रियादि भी अपने २ कारण में मिल जाते हैं । ("सँत जन साधो” पाठान्तर भी है ।)
(क्रमशः)

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