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*अमर आप रमता रमै, घट घट सिरजनहार ।*
*गुणातीत भज प्राणिया, दादू येह विचार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २४९)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*निर्जन में भक्तों की साधना*
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रात बहुत हो चुकी है । नौबतखाने के ऊपरवाले कमरे में मणि अकेले हुए हैं । आज अगहन की पूर्णिमा है । आकाश, गंगा, कालीमन्दिर, मन्दिरों के शिखर, उद्यानपथ, पंचवटी – सभी चन्द्रलोक से आलोकित है । मणि एकाकी श्रीरामकृष्ण का चिन्तन कर रहे हैं ।
रात के करीब तीन बज गए । मणि उठे और उत्तराभिमुख हो पंचवटी की ओर जाने लगे । श्रीरामकृष्ण ने पंचवटी की बात कही है । नौबतखाना अब अच्छा नहीं लग रहा है । मणि ने पंचवटीवाले घर में रहने का निश्चय किया ।
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चारों ओर नीरवता है । रात के ग्यारह बजे गंगा में ज्वार आया था । बीच बीच में पानी की आवाज सुनायी दे रही है । मणि पंचवटी की ओर बढ़ने लगे । इतने में उन्हें दूर से एक आवाज सुनायी पड़ी । मानो कोई पंचवटी के वृक्षमण्डप के भीतर से आर्त स्वर से पुकार रहा है – ‘कहाँ हो दादा मधुसूदन !’
आज पूर्णिमा होने के कारण वट वृक्ष की शाखा-प्रशाखाओं को भेदकर चन्द्र की किरणें प्रकाशित हो रही हैं ।
कुछ और अग्रसर होकर मणि ने दूर से देखा कि पंचवटी में श्रीरामकृष्ण के एक भक्त बैठे हुए निर्जन में एकाकी पुकार रहे हैं - ‘कहाँ हो दादा मधुसूदन !’ मणि निःस्तब्ध हो देखते रहे ।
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*परिच्छेद ६२*
*दक्षिणेश्वर में अंतरंग भक्तों के साथ*
*प्रह्लादचरित्र-श्रवण तथा भावावेश । स्त्रीसंग-निन्दा*
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में उसी पूर्वपरिचित कमरे में फर्श पर बैठे हुए प्रह्लाद-चरित्र सुन रहे हैं । दिन के आठ बजे होंगे । रामलाल ‘भक्तमाल’ ग्रन्थ से प्रह्लाद-चरित्र पढ़ रहे हैं ।
आज शनिवार, अगहन की कृष्णा प्रतिपदा है, १५ दिसम्बर १८८३ ई. । मणि दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण की पदच्छाया में ही रहते हैं । वे भी श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए प्रह्लाद-चरित्र सुन रहे हैं । कमरे में राखाल, लतू, हरीश भी हैं,– कोई बैठे हुए सुन रहे हैं, कोई आना-जाना कर रहे हैं । हाजरा बरामदे में हैं ।
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श्रीरामकृष्ण प्रह्लाद-चरित्र की कथा सुनते सुनते भावावेश में आ रहे हैं । जब हिरण्यकशिपु का वध हुआ, तब नृसिंह की रुद्र मूर्ति देख और उनका सिंहनाद सुनकर ब्रह्मादि देवताओं ने प्रलय की आशंका से प्रह्लाद को ही उनके पास भेज दिया । प्रह्लाद बालक की तरह स्तव कर रहे हैं । भक्तवत्सल नृसिंग बड़े प्रेम से प्रह्लाद की देह पर जीभ फिरा रहे हैं । ‘अहा ! भक्त पर कैसा प्यार है ।’ कहते हुए श्रीरामकृष्ण भावसमाधि में लीन हो गए । देह निःस्पन्द हो गयी है, आँखों की कोरों में प्रेमाश्रु दिखायी पड़ रहे हैं ।
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भाव का उपशम हो जाने पर श्रीरामकृष्ण उसी छोटे तख्त पर जा बैठे । मणि फर्श पर उनके चरणों के पास बैठे । श्रीरामकृष्ण उनसे बातचीत कर रहे हैं । ईश्वर के मार्ग पर रहकर जो लोग स्त्रीसंग करते हैं, उनके प्रति श्रीरामकृष्ण घृणा और क्रोध प्रकट का र्रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण – लाज भी नहीं आती – लड़के हो गए फिर भी स्त्रीसंग ! घृणा भी नहीं होती, - पशुओं का-सा व्यवहार ! लार, खून, मल, मूत्र – इन पर घृणा भी नहीं होती ! जो ईश्वर के पादपद्मों की चिन्ता करता है, उसे परम सुन्दरी स्त्री भी चिताभस्म के समान जान पड़ती हैं । जो शरीर नहीं रहेगा, जिसके भीतर कृमि, क्लेद, श्लेष्मा सब तरह की नापाक चीजें भरी हुई हैं, उसी को लेकर आनन्द ! लज्जा भी नहीं आती !
(क्रमशः)

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