शनिवार, 19 दिसंबर 2020

शूरातन का अंग २४ - ३०/३३

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ३०/३३)
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*दादू मरणां माँड कर, रहै नहिं ल्यौ लाइ ।*
*कायर भाजै जीव ले, आ-रण छाड़ै जाइ ॥३०॥*
कायर पुरुष कदाचित् आगे होने वाली अपने मृत्यु की उपेक्षा करके यदि रणभूमि में चला भी जाता है तो वहां पर शत्रुओं से डरकर फिर घर में आ जाता है । ऐसे ही कोई साधक अहंकार आदि शत्रुओं के विनाश के लिये यत्न करता हुआ भी यम नियमादिकों के अभाव से अपनी मन की वृत्ति को ब्रह्म में स्थिर नहीं कर सकता किन्तु विषयासक्ति के कारण विषयों में ही फिर आसक्त हो जाता है । अतः ब्रह्म में अपनी वृत्ति को स्थिर बनाने के लिये संयमादि साधनों की परम आवश्यकता है । अपरोक्षानुभूति में कहा है कि जो पुरुष परम पवित्र ब्रह्माकार वृत्ति को त्याग देते हैं वे पशु की तरह व्यर्थ ही जीते हैं । जो साधक ब्रह्माकार अपनी वृति को जानकर दिन रात बढ़ाते रहते हैं वे ही सत्पुरुष कहलाते हैं । वे त्रिलोकी में धन्य कहे जाते हैं । जिन सत्पुरुषों की बढ़ी हुई ब्रह्माकार वृत्ति परिपक्व होकर ब्रह्म में स्थित हो गई वे ही सद् ब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं, दूसरे नहीं ।
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*शूरा होइ सुमेर उलंघै, सब गुण बँध्या छूटै ।* 
*दादू निर्भय ह्वै रहे, कायर तिणा न टूटै ॥३१॥*
गुणों से बंधा हुआ भी शूरवीर सुमेरु सदृश विशाल सेना के समुदाय को भी निर्भय होकर पार कर जाता है और कायर तो तृण को भी तोड़ सकता । इसी तरह सुमेरु सदृश सुवर्ण वाली स्त्री के सौन्दर्य तथा स्त्री कृत मोह जाल को भी अनतिलंघनीय है पर करके प्रभु ध्यान में मस्त रहता हुआ अपने जीवन को पूरा कर देता है और कायर से तो तृण के समना तुच्छ भोग भी नहीं त्यागे जाते । अतः संसार की सुन्दरता के निवारण के लिये सदा प्रभु का ध्यान करना चाहिये । 
स्कन्द पु. में- जो एकाग्रचित्त, ब्रह्मचिन्तन परायण, प्रमादशून्य, पवित्र, एकान्तशील और जितेन्द्रिय है वह महामना योगी योग के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ।
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*॥ सूर सती साध निर्णय ॥*
*सर्प केसरी काल कुंजर, बहु जोध मारग मांहि ।*
*कोटि में कोई एक ऐसा, मरण आसंघ जाहि ॥३२॥*
प्रभु प्राप्ति के मार्ग में अनेक योद्धा शस्त्र लिये युद्ध करने को खड़े हैं । श्री दादू जी महाराज उनको बतला रहे हैं । सबसे पहले संशय रूपी सांप ही मुक्ति मार्ग में बाधक है । क्रोध रूपी सिंह इस संसार रूपी वन में भटक रहा है प्राणियों को मारने के लिये और यह महाबलवान् काम रूपी काल युद्ध के लिये ललकार रहा है । अतः करोड़ों साधकों के बीच में इनको जीतकर संसार से परे परमात्मा को प्राप्त करने वाले बिरले ही साधक मिलेंगे । 
नारद पु. में कहा है कि- अपकीर्ति के बराबर मृत्यु नहीं है । क्रोध के समान कोइ शत्रु नहीं । निन्दा के समान कोई पाप नहीं । मोह के समान कोई मादक पदार्थ नहीं, असूया के समान कोई अपकीर्ति नहीं, काम के समान कोई आग नहीं है और राग के समान कोई बन्धन नहीं । आसक्ति के समान कोई विष नहीं । अतः साधक को चाहिये कि इन दोषों को जीत ले ।
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*दादू जब जागै तब मारिये, वैरी जिय के साल ।*
*मनसा डायनि, काम रिपु, क्रोध महाबली काल ॥३३॥*
संसार की वासना रूपी पिशाचीनी महाबलवान् क्रोध रूपी काल कामरूपी शत्रु जब ही हृदय में उत्पन्न होने लगे तब ही इनको विवेक वैराग्य क्षमा आदि शस्त्रों से मार डालना चाहिये । अन्यथा ये पैदा हो कर महाबलवान् हो जायेंगे तो फिर इनको मारना कठिन हो जायेगा ।
(क्रमशः)

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