शनिवार, 19 दिसंबर 2020

(“षष्टमोल्लास” ५८/६०)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ५८/६०)
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*योग प्रकिख्या चक्र शोधनं*
*इड़ा पिंगला सुषमन सोई,*
*तिरबेणी के भेदी होई ।* 
*राख्या प्राण जु परम स्थानूं,*
*सिंभू द्वार धरै जु ध्यानू ॥५८॥* 
स्वामी जी कृपा से राजा ने इडा, पिंगला, सुषमना इन तीनों नाडियो के रहस्य को जान लिया था और इस प्रकार त्रिवेणी संगम में अपना मन व ध्यान प्रतिष्ठित कर लिया था । अपने प्राणों को उसने भ्रमरी गुफा में प्रतिष्ठित कर लिया एवं आज्ञाचक‘ में अपना ध्यान करने लग गया था ॥५८॥ 
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*योग की इक्कीस प्रकिख्या*
*अविंगत देव जपै भगवंतू,*
*ताकूं सुमिरै सबही संतू ।* 
*भई सुगमि ब्रह्मांड इक्कीसू,*
*निर्मल ज्योति तहां जगदीसू ॥५९॥* 
वह राजा स्वामी कृपा से मन अन्त:करण इन्द्रियों के अविषय रूप भगवन् ब्रह्म का ही सदा चिन्तन करता था जिसका सब ही संत स्मरण जाप करते हैं । उसके लिये मेरू दंड की २१ इक्कीस ग्रंथियां भेदन करना सुगम हो गया था जिससे वह अपनी वृति को ब्रह्म स्थान सहस्त्रार चक‘ में ही सदा लगाये रहता था ॥५९॥ 
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*तेज पुंज झिलमिलि भरपूरी,*
*परचै भये संजीवन मूरी ।* 
*परम ज्योति में खेंले प्राणूं,*
*मिट्यो अंधेरो निकस्यो भाणू ॥६०॥* 
उसका हृदय परम ज्योति ब्रह्म की चमक से परिपूर्ण हो गया एवं अमर करने वाली संजीवन बूंटी से परिचित हो गया था । उसके प्राणात्मा परम ज्योति स्वरूप ब्रह्म में क्रीड़ा करते थे, ब्रह्मज्ञान रूप सूर्य के उदय होने से उसका सम्पूर्ण अज्ञान तिमिर नष्ट हो गया ॥६०॥
(क्रमशः)

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