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*ज्यों आपै देखै आपको, यों जे दूसर होइ ।*
*तो दादू दूसर नहीं, दुःख न पावै कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ दया निर्वैरता का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु ---------दया
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द्रौपदी के पांचों पुत्रों को सोते समय अश्वत्थामा ने मार दिया, तब उसे पकड़ कर अर्जुन द्रौपदी के पास लाये । द्रौपदी को दया आ गई । वह अर्जुन से बोली - हे आर्य, हे वीर, इन गुरु पुत्र को छोड़ दो । इनका वध करने से गुरु पत्नि को भी मेरे समान ही शोक में डूबना होगा । मैं ऐसा नहीं चाहती, यह कह करके अश्वत्थामा को छुड़वा दिया ।
पुत्रघाति पर भी दया, करत दयालु धीर ।
कहा द्रौपदी ने पार्थ से, गुरु सुत छोड़ो वीर ॥१३८॥

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