शनिवार, 26 दिसंबर 2020

*त्याग और प्रारब्ध । वामाचार-साधन का निषेध*

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*दादू जड़मति जीव जाणै नहीं, परम स्वाद सुख जाइ ।*
*चेतन समझै स्वाद सुख, पीवै प्रेम अघाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ कस्तूरी मृग का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*त्याग और प्रारब्ध । वामाचार-साधन का निषेध*

(भक्तों से) “मन में लाने से ही त्याग नहीं किया जा सकता । प्रारब्ध, संस्कार ये सभी हैं । एक राजा से किसी योगी ने कहा, ‘तुम मेरे पास बैठकर परमात्मा का चिन्तन करो ।’ राजा ने उत्तर दिया, ‘यह मुझसे न होगा । मैं यहाँ रह सकता हूँ; परन्तु मुझे सब भी भोग करना है । इस वन में अगर रहूँगा तो आश्चर्य नहीं कि इस वन में भी एक राज्य हो जाए । मेरा भोग अभी बाकी है ।’
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“नटवर पाँजा जब बच्चा था, इस बगीचे में जानवर चराता था । परन्तु उसके भाग्य में बहुत बड़ा भोग था; इसीलिए तो इस समय अण्डी का कारखाना खोलकर इतना रुपया इकट्ठा किया है । आलमबाजार में अण्डी का रोजगार खूब चला रहा है ।
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“एक मत में है, स्त्री लेकर साधना करना । ‘कर्ताभजा’ सम्प्रदाय की स्त्रियों के बीच में एक बार एक आदमी मुझे ले गया था । वे सब मेरे पास आकर बैठ गयीं । मैं जब उन्हें ‘माँ माँ’ कहें लगा तब वे आपस में कहने लगीं, ये प्रवर्तक हैं, अभी ‘घाट’ की पहचान इनको नहीं हुई ! उन लोगों के मत में कच्ची अवस्था को प्रवर्तक कहते हैं, उसके बाद साधक, उसके बाद सिद्ध और फिर सिद्ध का सिद्ध ।
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“एक स्त्री वैष्णवचरण के पास जाकर बैठी । वैष्णवचरण से पूछने पर उन्होंने कहा, इसका बालिकाभाव है ।
“स्त्री-भाव से शीघ्र पतन होता है । मातृभाव शुद्ध भाव है । 
काँसारीपपाड़ा के भक्तगण उठ पडे । कहा, तो अब हम लोग चलें; कालीमाई तथा और देवों के दर्शन करेंगे ।
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(२)
*श्रीरामकृष्ण और प्रतिमापूजा । व्याकुलता और ईश्वरलाभ* 

मणि पंचवटी और कालीमन्दिर के विभिन्न स्थानों में अकेले घूम रहे हैं । श्रीरामकृष्ण ने कहा है, ‘थोड़ी साधना करने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं ।’ क्या मणि यही सोच रहे हैं ?
फिर श्रीरामकृष्ण ने तीव्र वैराग्य की बात कही और कहा कि माया को पहचान लेने पर वह भाग खड़ी होती है । मणि यही सब सोच रहे हैं ।
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पिछला पहर है, साढ़े तीन बजे का समय होगा । मणि फिर आकर श्रीरामकृष्ण के कमरे में बैठे हैं । ब्राउटन इंस्टिट्यूशन से एक शिक्षक कुछ छात्रों को साथ लेकर श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आए हुए हैं । श्रीरामकृष्ण उनसे वार्तालाप कर रहे हैं । शिक्षक महाशय बीच बीच में एक एक प्रश्न कर रहे हैं । बातचीत मूर्तिपूजन के सम्बन्ध में हो रही है ।
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श्रीरामकृष्ण(शिक्षक से) – मूर्तिपूजन में दोष क्या है ? वेदान्त में हैं, जहाँ ‘अस्ति, भाति और प्रिय’ है, वहीँ उनका प्रकाश है, इसलिए उनके सिवाय और किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है ।
“और देखो, छोटी छोटी लड़कियाँ कितने दिन गुड़िया लेकर खेलती हैं ? जितने दिन तक विवाह नहीं होता और जितने दिन तक वे पति-सहवास नहीं करतीं । विवाह हो जाने पर गुड़ियाँ-गुड्डों को उठाकर सन्दूक में रख देती हैं । ईश्वरलाभ हो जाने पर फिर मूर्तिपूजन की क्या आवश्यकता है ?”
मणि की ओर देखकर श्रीरामकृष्ण कहते हैं – “अनुराग होने पर ईश्वर मिलते हैं । खूब व्याकुलता होने पर संपूर्ण मन उन्हें अर्पित हो जाता है । 
(क्रमशः)

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