मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ १७/२०*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ १७/२०*
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इंद्र इंद्रासन अमर पद, ब्रह्मा लोक बिलास ।
जगजीवन हरि भगति बिन, ए सब झूठीं आस ॥१७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इन्द्र इन्द्रासन व बैकुण्ठ का अमर वास ब्रह्मा का ऐश्वर्य ये सब प्रभु की भक्ति के बिना झूठी आशा के समान है ।
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इहै भगति भगवंत की, गुरु गोबिंद स्यौं दीन ।
कहि जगजीवन परम मत, परम पुरिष स्यौं लीन ॥१८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो सद्गुरु महाराज ने बताया है वह ही भगवान की भक्ति है । सबसे परम मत यह ही है कि परम परमात्मा में लीन रहो ।
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प्रेम१ भगति ज्येष्ठ धरमं, सुक्रित सुमिरण रांमं ।
कहि जगजीवन परम निगम क्रितं, करम कनीष्ठ कामं ॥१९॥
{१-१. नामसाधना में प्रेमा भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ उपाय बताया है । नांमस्मरण भी उसमें सत्कर्म माना जाता है । परन्तु वेद पुराणों में प्रतिपादित कर्मकाण्ड इस साधना में हीन(निकृष्ट) कर्म ही माना गया है ॥१९॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नाम साधना ही सबसे बड़ा धर्म है प्रेमा भक्ति में स्मरण ही सत्कर्म कहा गया है किन्तु नित्य केवल कर्मकांड ही करना छोटा कार्य बतलाया गया है यह उद्धारक नहीं है ।
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धरम२, अगनि, तसकर, न्रिप, लिछमी भ्राता चार ।
कहि जगजीवन जेष्ठ वृधि, कनिष्ठ न झंकै द्वार२ ॥२०॥ 
२-२. लौकिक धन(लक्ष्मी) के ये चार भ्राता(साथी) माने गये हैं- १. धर्म, २. अग्नि, ३. चौर एवं ४. राजा । उसकी प्राप्ति में, इन चारों में जब ज्येष्ठ (धर्म) बलवान् होता है तो शेष तीन उस धन की ओर आँख उठा कर भी नहीं देख पाते ॥२०॥
(क्रमशः)

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