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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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५४. स्वरूप गति हैरान । वर्ण भिन्न ताल ~
ऐसा राम हमारे आवै,
वार पार कोई अन्त न पावै ॥टेक॥
हलका भारी कह्या न जाइ,
मोल माप नहीं रह्या समाइ ॥१॥
कीमत लेखा नहीं परिमाण,
सब पच हारे साधु सुजाण ॥२॥
आगो पीछो परिमित नांहिं,
केते पारिख आवहिं जाहिं ॥३॥
आदि अन्त मधि कहै न कोइ,
दादू देखै अचरज होइ ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव राम के साक्षात्कार स्वरूप का आश्चर्य दिखा रहे हैं कि हमारे अनुभव में ऐसा राम का स्वरूप आता है कि उसके स्वरूप का उरला किनारा और परला किनारा का कोई अन्त नहीं पाते ।
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न उसको हलका कह सकते हैं और न भारी कहा जाता है, क्योंकि डाकोर जी में रामदास भक्त के यहाँ हलके बन गये और नामदेव भक्त के यहाँ भारी बन गये ।
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न उनका कोई मूल्य है, और न उनके स्वरूप का कोई माप - तोल ही कर सकता है, क्योंकि वह सबमें परिपूर्ण रूप से व्याप्त हो रहे हैं । किसकी मति है, जो उनका कोई लेखा - हिसाब से पार पा सके ?
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सुजान, चतुर, नित्य, अनित्य का विचार करने वाले सभी संत थकित हो रहे हैं, क्योंकि न तो राम का आगा है और न पीछा ही है, और न मिति है कि फलाँ मिति से राम चले आ रहे हैं ? कितने ही विवेकी अनुभव द्वारा राम का विचार करते - करते राममय हो गये !
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और कितने ही अनुभव द्वारा राम का विचार करते हुए जा रहे हैं, परन्तु न तो किसी ने राम का आदि कहा है और न मध्य ही बताया है और न अन्त ही कहा है । उसके स्वरूप को अनुभव द्वारा साक्षात्कार कर - करके आश्चर्य करते हैं ।
रामदास डाकोर में, हलके भये रणछोड़ ।
भारी नामा के भये, तुला चढ्यो धन जोड़ ॥५४॥
(भक्तमाल)

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