शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

= “च. विं. त.” २४/२५ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
.
*(“चतुर्विंशति तरंग” २४/२५)*
*इन्दव छन्द*
*राजा ने २ हाथियों का भार धन भेंट किया ~*
भूप नारायण दो गज अर्पत, 
भेंट करे धन शाल चढाई ।
वस्त्र सुखासन मेवा धरे बहु, 
स्वामिजु बाँटत त्यों अधिकाई ।
ज्यों धन बाँटत, त्यौ धन आवत, 
द्रव्य लुटावत आवत जाई ।
मास अषाढ प्रतीपद हो बुदि, 
संत प्रसाद लहें चलि जाई ॥२४॥ 
.
शीश निवाय कहें कर जोड़त, 
द्यो सब संत को जू अशीशा ।
ले परसाद अशीश सुसेवक, 
बारम्बार निवावत शीशा ।
स्वामी मिलें उठि संत महंतहिं, 
संत दया रखि मोहि तपीशा ।
सिद्ध करे गुरुदेव दयानिधि, 
लाज रखें सब भाखि मुनीषा ॥२५॥ 
.
राजा नारायणसिंह ने भेंट स्वरूप दो हाथी, अतुल धन, अनेक शाल, विविध वस्त्र, सुखासन तथा मेवा मिष्ठान आदि गरीबदास जी को अर्पित किये । स्वामी गरीबदास जी के धन सम्पत्ति भेंट में आती रहती । आषाढ़ मास की कृष्णा प्रतिपदा के दिन भोजन प्रसाद कराकर सादर भेंट के साथ समागत साधु संतों तथा भक्त सेवकों को विदा किया गया । 
.
विदा होते समय सभी संत हाथ जोड़कर गरीबदास जी को शीश निवाने लगे, और आशीष मांगने लगे । स्वामी जी उठकर सभी से गले मिले; संत महंतों से त्यागी तपस्वियों से निवेदन किया कि - मुझ पर दया बनाये रखना । तब संतों ने कहा - दयानिधि गुरुदेव सभी कार्य सिद्ध करेंगे, वे ही हम सबकी लाज रखेंगे । भक्त सेवकों ने भी बारंबार शीश निवाकर प्रणाम किया, प्रसाद और आशीष लेकर विदा हुये ॥२४ - २५॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें