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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी ~ विनती कौ अंग ३४ - १०/१३)*
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*गुनहगार अपराधी तेरा, भाजि कहाँ हम जाहिं ।*
*दादू देख्या शोध सब, तुम बिन कहीं न समाहिं ॥१०॥*
हे राम ! मैं आपके समक्ष सदा ही अपराधी हूँ और दादू ने अच्छी तरह देख लिया है कि इस जगत् में आपके बिना कुछ भी सूना नहीं है । अर्थात् आप सब जगह व्यापक हैं । अतः यदि मैं भाग कर जाऊं तो भी कहां जाऊं । क्योंकि आपकी सर्वत्र सत्ता है ॥१०॥
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*आदि अंत लौं आय कर, सुकृत कछू न कीन्ह ।*
*माया मोह मद मत्सरा, स्वाद सबै चित दीन्ह ॥११॥*
मैंने जन्म से लेकर मरणपर्यन्त कुछ भी सुकृत कर्म नहीं किये । किन्तु मोह माया मात्सर्य तथा इन्द्रियजन्य विषय विकार के आनन्द में ही अपना मन लगाया ॥११॥
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*काम क्रोध संशय सदा, कबहूँ नाम न लीन ।*
*पाखंड प्रपंच पाप में, दादू ऐसे खीन ॥१२॥*
मैंने इस लोक में अपने जीवन को काम क्रोध संशय में पड कर बिना राम की भक्ति के व्यर्थ ही खो दिया । कभी राम का नाम भी तो नहीं लिया और पाप पाखण्ड के द्वारा इस लोक में अपनी बुद्धि की प्रवृत्ति को भोगों में ही लगाई रखी ॥१२॥
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*दादू बहु बंधन सौं बंधिया, एक बिचारा जीव ।*
*अपने बल छूटै नहीं, छोड़नहारा पीव ॥१३॥*
यह अकेला बिचारा जीव चिरकाल से अनेकों दृढ़ बन्धनों में बंधा हुआ है और अपनी शक्ति से स्वयं मुक्त नहीं हो सकता है । हे नाथ ! आप ही इसको मुक्त करने वाले हैं ॥१३॥
(क्रमशः)

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