सोमवार, 29 मार्च 2021

*अनेक रूपों में वही*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*सेवक सिरजनहार का, साहिब का बंदा ।*
*दादू सेवा बंदगी, दूजा क्या धंधा ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ सांच का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(हठयोगी आता है ।)
पंचवटी में कई दिनों से एक हठयोगी रहते हैं । वे सिर्फ दूध और अफीम खाते हैं और हठयोग करते हैं । रोटी-भात, यह कुछ नहीं खाते । अफीम और दूध के दाम उनके पास नहीं हैं । श्रीरामकृष्ण जब पंचवटी के पास गये थे तब वे हठयोगी से बातचीत करके आये थे । हठयोगी ने राखाल से कहा था, ‘परमहंसजी से कहकर मेरी कोई व्यवस्था करा देना ।’ श्रीरामकृष्ण ने कहला भेजा था कि कलकत्ते के बाबू जब आयेंगे तब उनसे कहा जायगा ।
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हठयोगी – (श्रीरामकृष्ण से) – आपने राखाल से क्या कहा था ?
श्रीरामकृष्ण – कहा था, बाबुओं से कहूँगा । अगर वे कुछ देंगे तो दे देंगे । परन्तु क्यों – (प्राणकृष्णादि से) तुम शायद इन्हें like(पसन्द) नहीं करते ?
प्राणकृष्ण चुपचाप बैठे रहे ।
(हठयोगी चला जाता है ।)
श्रीरामकृष्ण की बातचीत होने लगी ।
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श्रीरामकृष्ण – (प्राणकृष्णादि भक्तों से) – और संसार में रहने पर सत्य का खूब ध्यान चाहिए । सत्य से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है । मेरी तो इस समय सत्य की दृढ़ता कुछ कम हो गयी है, पहले बहुत थी । ‘नहाऊँगा’ यह कहा नहीं कि गंगा में उतरा, मन्त्रोच्चारण किया, सिर पर पानी भी डाला, परन्तु फिर भी सन्देह होता था कि शायद अच्छी तरह नहाना अभी नहीं हुआ । अमुक स्थान पर शौच के लिए जाऊँगा यह सोचा नहीं कि वहीँ गया । राम के मकान गया, कलकत्ते में । कह दिया कि पूड़ियाँ न खाऊँगा । जब खाने को दिया गया, तब देखा, भूख लगी है; परन्तु कह जो दिया है कि पूड़ियाँ न खाऊँगा तो मजबूरन मिठाई से पेट भरा ।
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(सब हँसते हैं ।) इस समय तो दृढ़ता कुछ घट गयी है । टट्टी की हाजत्त नहीं है, परन्तु कह डाला है कि टट्टी जाऊँगा, क्या किया जाय ? राम* से पूछा, उसने कहा, नहीं लगी है तो जाकर क्या कीजियेगा ? तब मैंने विचार किया, सभी तो नारायण हैं, राम भी नारायण है, उसकी बात क्यों न मानूँ ? हाथी नारायण है, परन्तु महावत भी तो नारायण है । महावत जिस समय कह रहा है, हाथी के पास मत आओ, उस समय उसकी बात क्यों न मानी जाय ? इस तरह विचार करके अब पहले की अपेक्षा दृढ़ता कुछ घट गयी है । (*राम चॅटर्जी – दक्षिणेश्वर मन्दिर के एक पूजारी ।)
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“अब इस समय देख रहा हूँ, एक और अवस्था आ रही है । बहुत दिन हुए वैष्णव चरण ने कहा था, आदमी के भीतर जब ईश्वर के दर्शन होंगे, तब पूर्ण ज्ञान होगा । अब देख रहा हूँ, अनेक रूपों में वही विचरण कर रहे हैं । कभी साधु के रूप में, कभी छल-रूप में, और कभी खल-रूप में । इसीलिए कहता हूँ, साधुरुपी नारायण, छलरुपी नारायण, खलरुपी नारायण, लुच्चारुपी नारायण ।
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“अब चिन्ता है, सब को किस तरह भोजन कराया जाय । सब को भोजन कराने की इच्छा होती है । इसलिए एक-एक आदमी को यहाँ रखकर भोजन कराता हूँ ।”
प्राणकृष्ण – (मास्टर को देखकर, सहास्य) – अच्छा आदमी है ! (श्रीरामकृष्ण से) महाराज, नाव से उतरकर ही दम लिया !
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – क्या हुआ ?
प्राणकृष्ण – ये नाव पर चढ़े थे; जरा सी लहर की टक्कर लगी और इन्होंने कहा, उतार दो हमको – (मास्टर से) किस तरह फिर आये आप ?
मास्टर – (सहास्य) – पैदल चलकर ।
(क्रमशः)

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