गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

*१५. माया कौ अंग ~ ४९/५२*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१५. माया कौ अंग ~ ४९/५२*
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आसा के तरवर६ बसै, पंछी सकै न ऊड़ ।
जगजीवन हरि भगति बिन, धरस्यूं हरि की बूड़७ ॥४९॥
(६. तरवर=वृक्ष) (७. बूड़=बदनामी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार मे जीव आशा रुपी वृक्ष पर बंधे है वे चाहकर भी नहीं उड़ पाते और प्रभु की भक्ति के बिना वह बदनामी को प्राप्त होते हैं ।
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आसा को तरवर त्रिया, कुसुम मोह कांम ।
कहि जगजीवन चाखि नर, बिसरि गये सुख रांम ॥५०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं की स्त्री आशा रुपी वृक्ष है जिस पर काम व मोह के फूल खिले हैं और इनका आस्वादन कर जीव सुख स्वरूप राम को ही भूलते हैं ।
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माया की मंड़ी८ स्त्री, माया की मंड़ी दांम ।
जगजीवन हरि भगति की, मंड़ी रांम का नांम ॥५१॥
(८. मंड़ी=वासस्थान)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि स्त्री व धन माया रचित है । और प्रभु की भक्ति राम रचित है ।
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माया मंडण९ बेद बिधि, माया रास विलास ।
माया गोपी कान्ह धरि, सु कहि जगजीवनदास ॥५२॥
{९. मंडण=रचना (शोभा)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि माया वेदों में भी कही गयी है । माया स्वयं को राम भी कहती है । माया का रास भी कृष्ण व गोपी की भांति है वह विमोहित करती है ।
(क्रमशः)

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