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*दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।*
*दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥*
*करणहार कर्त्ता पुरुष, हमको कैसी चिंत ।*
*सब काहू की करत है, सो दादू का दादू मिंत ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*रुक्मांगद सुता की पद्य टीका*
*ग्यारस को व्रत सत्य कर्यो नृप,*
*बात सुनो एक तासु सुता की ।*
*लेन पिता पुर आय स्वयं वर,*
*माँगत अन्न क्षुधा अति पाकी ॥*
*देत नहीं हरि-बासर जानत,*
*आज मरे गति हो भल याकी ।*
*प्रान तजे उन वेगि मिले प्रभु,*
*भाष कही पन रीति तिया की ॥७६॥*
रुक्मांगद ने तो एकादशी का व्रत सत्यता पूर्वक किया ही था । अब उसकी पुत्री की एकादशी व्रत निष्ठा की भी एक बात सुनो । रुक्मांगद की पुत्री का पति स्वयं ही अपनी पत्नी को लेने अपने ससुराल रुक्मांगद के घर आया था । उस दिन एकादशी थी । किसी ने भी उसे भोजन नहीं कराया । तब उसने अपनी पत्नी से कहा – मुझे बहुत भूख लगी है, बिना खाये मेरे प्राण चले जायेंगे ।
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फिर भी एकादशी व्रत में विशेष भाव होने से उसने भोजन नहीं दिया और बोली –आज हरिवासर है । उस व्रत की समानता वाला अन्य कोई भी व्रत नहीं है । फिर मन में विचारा यदि आज मृत्यु भी हो जायगी तो इनकी अति उत्तम वैकुण्ठ की प्राप्ति रूप मुक्ति होगी । राजकुमार के प्राण भूख से चले ही गये । तब अति शीघ्र उसी समय वह प्रभु को प्राप्त हो गया । कवियों ने उस राजकुमार की पत्नी की रीति ऐसे ही कथन करी है तथा उसके प्रण की सफलता और उसके पतिलोक की प्राप्ति की बात भी कही है ।
(क्रमशः)

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