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*दादू साहिब कसै सेवक खरा, सेवक को सुख होइ ।*
*साहिब करै सो सब भला, बुरा न कहिये कोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पारिख का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मयूरध्वज की पद्य टीका*
*रोग भयो गर्व अर्जुन के अति,*
*कृष्ण जु जान दियो रस भारी ।*
*है मम भक्त सु तोहि दिखावत,*
*बालक वृद्ध भये ब्रह्मचारी ॥*
*जाय पहौंचत मोरध्वजं गृह,*
*वेगि कहो नृप बात हमारी ।*
*जाय कही अब सेव करूं हरि,*
*बैठ हु यूं सुन आगि प्रजारी ॥७७॥*
मयूरध्वज द्वापर के अन्त में रत्नपुर के राजा हुये हैं । ये धर्मात्मा और भगवान् के भक्त थे । एक समय इनका अश्वमेघ का घोड़ा छूट रहा था । उसके साथ इनके वीर पुत्र ताम्रध्वज तथा प्रधान मंत्री सेना के सहित थे । उन्हीं दिनों धर्मराज युधिष्ठिर का अश्वमेघ यज्ञ हो रहा था । उनके घोड़े के साथ अर्जुन और भगवान् कृष्ण थे । मणिपुर में दोनों की मुठभेड़ हो गयी । उन दिनों भगवान् का सारथी होने और अनेक वीरों पर विजय प्राप्त से अर्जुन के मन में कुछ अपनी भक्ति और वीरता का गर्व सा हो गया था । भगवान् ने जो भारी सख्य भक्ति रस प्रदान किया था उसका गर्व रूप महान् रोग भी अर्जुन में मन में भगवान् ने जाना और उसको नष्ट करने के लिये एक अद्भुत लीला रची ।
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युद्ध में श्री कृष्ण के ही बल पर ताम्रध्वज ने अर्जुन और श्रीकृष्ण को मुर्च्छित कर दिया और दोनों घोड़ों को पिता के पास ले गया । पिता ने कहा श्री कृष्ण को छोड़कर घोड़े लाये यह ठीक नहीं किया । उधर अर्जुन की मूर्च्छा टूटी तब घोड़े के लिये श्री कृष्ण के आगे व्यग्रता प्रकट करने लगे । तब श्री कृष्ण ने अपने छिपे हुये भक्त को दिखाने के लये कहा – एक मेरा श्रेष्ठ भक्त है, उसी के यहां घोड़ा मिलेगा ।
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उसको मैं तुम्हें दिखाता हूँ, यह कह कर आप तो वृद्ध ब्राह्मण बने और अर्जुन को अपना ब्रह्मचारी बालक बनाया । फिर मयूरध्वज के घर जा पहुँचे । द्वारपालादि से कहा – तुम शीघ्र जाकर राजा को हमारे आने की सूचना दो । उनने जाकर राजा को कहा ।
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राजा ने कहा – मैं हरि पूजा करके आता हूं, उनको कहो थोड़ी देर बैठें । जब आकर इनको कहा तो सुनते ही इनके मन में क्रोध रूप अग्नि प्रज्वलित हो गया ।
(क्रमशः)

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