शनिवार, 3 अप्रैल 2021

*१५. माया कौ अंग ~ ५७/६०*

 
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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१५. माया कौ अंग ~ ५७/६०*
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माया कनक कामिनी कहिये, माया कहिये दांम ।
जगजीवन ए त्यागि सब, जे तूं चाहै रांम ॥५७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि माया स्वर्ण है स्त्री है, माया धन है । इन सब को छोड़कर ही राम मिलते हैं ।
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साजन१ मिलि मंगल करै, मस्तक मेल्है मौड़२ ।
जगजीवन जांनैं नहीं, नार करै घर चौड़३ ॥५८॥
(१. सजन=पति) (२. मौड़=मुकुट) (३. चौड़=चौर्य, या नाश)
संतजगजीवन जी कहते हैं जब प्रियतम परमात्मा मिलते हैं तो सभी कुछ मंगल होता है । और वे सबसे श्रेष्ठ कर देते हैं मुकुट अर्थात निवृत्ति देते हैं व जब स्त्री रूपिणी माया में रमते हैं तो सब कुछ पतन होता है ।
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ब्याह्या सो देखत बह्या, नर नारी सौं लागि ।
जगजीवन संसार सब, दाझि मुवा इहिं आगि ॥५९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो विवाहित हुआ वह देखते देखते ही संसार सागर में बह गया । यह स्त्री पुरुष के संग का परिणाम है । सारा संसार ही इस अग्नि से जल रहा है ।
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द्वारा४ कछु इक खूब५ था, व्याह्या दिया बहाइ ।
जगजीवन सरवस६ हर्या, माया मंदिर आइ ॥६०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि माया द्वार आश्चर्य जनक है इसमें जिसने प्रवेश लिया वह बह गया इस माया ने उसका सब कुछ ले लिया या छीन लिया जो इसमें आगया ।
{४. द्वारा=वासस्थान (=घर)} (५. खूब=सुन्दर)
{६. सरवस=सर्वस्व(सब कुछ सम्पति)}
(क्रमशः)

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