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*जे पहुँचे ते कह गए, तिनकी एकै बात ।*
*सबै सयाने एक मत, उनकी एकै जात ॥*
*सबै सयाने कह गये, पहुँचे का घर एक ।*
*दादू मार्ग माहिं ले, तिन की बात अनेक ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*विद्या माहात्म्य का अंग १४७*
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विद्या बंधू जीव की, अविद्या को काल ।
धरे१ अधर२ बिच देखिये, प्राण हु की प्रतिपाल ॥९॥
विद्या जीव के लिये बान्धव के समान है, अविद्या के लिये काल रूप है, मायिक संसार१ और ब्रह्म२ दोनों के बीच में रह कर प्राणियों की रक्षक है ।
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विद्या लधु बीरध सबै, विद्या पावै ठौर ।
रज्जब विद्या जीव को, करै और से और ॥१०॥
लधु होने पर भी विद्या से सब बड़े हो जाते हैं, विद्या से उत्तम स्थान प्राप्त है, विद्या जीव को और से और बना देती है ।
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नर निगलैं निरमोल१ नग, त्यों लें विद्या मांहिं ।
रज्जब आनन्द उगलतां, दुख दालिद सब जांहिं ॥११॥
जैसे कोई नर अमूल्य१ नग निगल जाय, फिर उसे उगल दे तो तो धनी हो जाता है, वैसे ही विद्या को भीतर धारण करना चाहिये, फिर दूसरों को देते समय बड़ा आनन्द आयेगा, दुख दारिद्र सब चले जाँयेगे ।
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विद्या कर वेत्ता भये, विद्या कर सु प्रवीन ।
विद्या कर नागर निपुण, रज्जब विद्या लीन ॥१२॥
विद्या अभ्यास से मनुष्य ज्ञानी हुये हैं । विद्या से प्रवीण हो जाते हैं, विद्या से सभ्य और निपुण हो जाते हैं । अत: विद्या पढ़ने में तत्पर होना चाहिये ।
(क्रमशः)

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