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*भाव भक्ति उपजै नहीं, साहिब का प्रसंग ।*
*विषय विकार छूटै नहीं, सो कैसा सत्संग ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वाणी विचार का अंग १४६*
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रज्जब वाणी सत्य सो, जा माँहिं निज१ नाम ।
कहा प्राकृत अरु संस्कृत, राम बिना बेकाम२ ॥१३॥
वही वाणी सत्य है, जिसमे निज नाम हो, क्या प्राकृत और क्या संस्कृत राम के बिना तो व्यर्थ२ ही है विशेष विवरण - नाम तीन प्रकार के होते हैं - गुणज, जैसे दयालु । कर्मज जैसे मधुसूदन । निज, जो स्वरूप-मय१ हो, जैसे ब्रह्म राम आदि । जिस वाणी में निज नामों द्वारा प्रभु का वर्णन हो, उसे संत श्रेष्ठ मानते हैं ।
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उज्वल मैले भाव द्वै, बहु वाणी चित्राम ।
रज्जब सन्मुख शब्द ले, विमुख बात बेकाम ॥१४॥
बहुत से चित्राम होते हैं, उनमें श्वेत और काला दो रंग होते हैं । वैसे भी बहुत सी वाणियां होती हैं, उनमें भी उज्वल और मलीन दो भाव रहते हैं । जो वाणी प्रभु के सन्मुख करे वही उज्वल है, उसे ग्रहण करना चाहिये और जो वाणी प्रभु से विमुख करे, उस वाणी की बात मलिन और व्यर्थ है, उसे त्याग देना चाहिये ।
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त्रय-योजन१ बोली पलट, बहु वसुधा२ बहु वाणि३ ।
रज्जब लीजे शब्द सत, राम नाम निज४ छाणि५ ॥१५॥
बारह१ कोस पर वाणी बदल जाती है और पृथ्वी२ बहुत है, अत: भाषा३ भी
बहुत हैं । जिसमें सत्य शब्द हो, राम का नाम हो, उस भाषा को निजी४ समझ, अन्यों से अलग५ करके ग्रहण करें ।
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राम विमुख वाणी बुरी, कहैं साधु सब वेद ।
जन रज्जब तिन को तजै, पाया भाषा भेद ॥१६॥
साधु और वेद कहते हैं कि - जिस वाणी में राम का यश न हो वह वाणी राम से विमुख होने से खराब है । ऐसी वाणियों को त्याग देना चाहिये । हमने भाषा का रहस्य, ज्ञान द्वारा ऐसा ही जान पाया है ।
(क्रमशः)

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