सोमवार, 12 अप्रैल 2021

*नवधा भक्ति के प्रधान भक्त*

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*भाव भक्ति रहै रस माता, प्रेम मगन गुण गावै ।*
*जीवत मुक्त होइ जन दादू, अमर अभय पद पावै ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २६७)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*नवधा भक्ति के प्रधान भक्त*
मूल छप्पय –
*जन राघव नवधा भक्ति,*
*करत मिटे जामण मरण ॥*
*श्रवण परीक्षित तिरयो,*
*शब्द ध्वनि शुक मुनि गावै ।*
*चरण पलौटत लच्छि१,*
*आदि अविगत२ हि रिझावै ॥*
*भजन सुदृढ़ प्रहलाद,*
*श्वफल्क सुत वन्दनकारी ।*
*दासातन३ हनुमन्त,*
*सखा पारथ पण धारी ॥*
*पृथु अर्चा बलिपिंड ब्रहमाण्ड,*
*सर्वस्व दे गयो हरि चरण ।*
*जन राघव नवधा भक्ति,*
*करत मिटे जामण मरण ॥१२२॥*
भगवान् की नवधा भक्ति जन्म स्मरण को नष्ट करने वाली है । नवधा के प्रधान भक्त नव हैं । उनके नाम बता रहे हैं –
*१.श्रवण भक्ति के प्रधान भक्त परीक्षित हैं ।* आप श्रवण भक्ति करके संसार-सागर को तैर गये हैं । परीक्षित की कथा छप्पय ५४ टीका में तथा पद्य टीका के पद्य ८८ में देखें ।
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*२.शब्दध्वनि अर्थात् कीर्तन भक्ति के प्रधान भक्त शुकदेवजी हैं ।* आपने ही श्रीमद्भागवत का गायन किया था । शुकदेवजी की कथा छप्पय ६५ की टीका में तथा पद्य टीका के पद्य ८९ में देखें ।
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*३.पाद सेवन भक्ति की प्रधान भक्त लक्ष्मीजी१ हैं ।* आप विश्व के आदि कारण मन इन्द्रियों के अविषय२ भगवान् की चरण सेवा करके उन्हें प्रसन्न करती हैं । लक्ष्मीजी की कथा छप्पय ३५ की टीका में देखें ।
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*४.स्मरण भक्ति के प्रधान भक्त प्रहलादजी हैं ।* आप बड़ी दृढ़ता से स्मरण करते हैं । प्रहलादजी की कथा मूल मनहर १२० में तथा पद्य टीका के पद्य ८६ में देखें ।
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*५.वन्दना भक्ति के प्रधान भक्त श्वफल्क पुत्र अक्रूरजी हैं ।* अक्रूरजी की कथा पद्य टीका के पद्य ८७ में देखो ।
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*६.दास्य३ भक्ति के प्रधान भक्त हनुमान जी हैं ।* हनुमान जी की कथा पद्य टीका के पद्य २८ में देखें ।
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*७.सख्य भक्ति के प्रधान भक्त अर्जुन हैं ।* अर्जुन सत्य प्रतिज्ञा धारण करते थे अर्थात् प्रतिज्ञा तजते नहीं थे । अर्जुन इन्द्र के द्वारा कुन्ती के गर्भ से उत्पन्न हुये थे । आपने युद्ध में साक्षात् भगवान् शंकर जी को भी तृप्त किया था । सशरीर स्वर्ग में गये थे । निवात कवचों को मारा था । आप भगवान् कृष्ण को अति प्रिय थे । आपका चरित्र महाभारत में बहुत है ।
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*८.अर्चना भक्ति के प्रधान भक्त महाराज पृथु हैं ।* पृथु की कथा छप्पय ५४ की टीका में देखें ।
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*९.आत्म निवेदन भक्ति के प्रधान भक्त बलि हैं ।* बलि अपना शरीर तथा ब्रह्माण्ड रूप अपना सर्वस्व हरि चरणों में समर्पण करके हरि को प्राप्त हुये हैं । बलि की कथा छप्पय ८५ में देखें ।
(क्रमशः)

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