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*जब लग लालच जीव का,*
*काया माया मन तजै, तब चौड़े रहै बजाइ ॥*
*तब लग निर्भय हुआ न जाइ ।*
*(श्री दादूवाणी ~ शूरातन का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###.
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- कर्म
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विदुला के पुत्र संजय के देश पर सिंधु नरेश ने चढाई कर दी । उसकी सेना देखकर संजय यह सोच कर कि इसे जीतना असंभव है, अपने महल में जाकर सो गया । जब उसकी माता विदुला ने यह जाना तब वह उसके पास जाकर बोली - "पुत्र ! शत्रु देश को नष्ट भ्रष्ट कर रहा है, शत्रु विनाश किये बिना ही तू यहां आकर कैसे सो रहा है ? संजय - 'माताजी ! शत्रु सेना विशाल है, उसे जीतना असंभव है ।'
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अरे ! पुरुषार्थ का आश्रय कर, प्राणों का लोभ छोड़ प्रजा की रक्षा करना अपना मुख्य धर्म समझ, निर्भय होकर शत्रु का सामना कर । तेरा कायरों की भांति यहाँ आकर सोना अच्छा नहीं लगता । या तो वीरता के साथ युद्ध में मर कर स्वर्ग मे जा या विजय करके यहां आना, मेरे दूध को कभी नहीं लजाना । इत्यादि उपदेशों से उत्साहित कर पुत्र को युद्ध में भेजा । संजय भी अपने जीवन को हथेली में रखकर शत्रु से भिड़ गया और विजयी भी हुआ ।
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जो संतित का धर्म में, नव उत्साह बढात ।
सुन्दर शिक्षा दे सदा, सोई मातु सुमात ॥९॥
पुत्र प्राण लोभ न करे, चाहे सुयश सुमात ।
विदुला संजय मातु की, कथा परम प्रख्यात ॥१०॥

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