गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

*१५. माया कौ अंग ~ ९३/९६*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१५. माया कौ अंग ~ ९३/९६*
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कहि जगजीवन बसत८ का, गाहक९ बिरला कोइ ।
जियरा भूखा झूंठ का, फिरि फिरि बांछै सोइ ॥९३॥
(८. बसत=वस्तु, मूल्यवान् पदार्थ) (९. गाहक=ग्राहक, लेने वाला)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सत्य का ग्राही कोइ विरला ही होता है । मन तो असत्य में रमता है और बार बार उन झूठी शान शौकत की ही चाहना करता है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, सात समंद का नीर ।
एक घाट बांघणि पीवै, बधै सोइ गुरु पीर ॥९४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सात जल परि पूर्ण समुद्र होने पर भी संत रुपी बाघिन तो अपने प्रभु घाट रुपी जल का ही सेवन करती है । वह अन्यत्र नहीं भटकती है ।
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दम टूटै तो क्यूं जुड़ै, क्यूं थिति थंभै नीर ।
कहि जगजीवन रांमजी, मछली खाया कीर१० ॥९५॥
(१०. कीर=व्याध या सर्प)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि दम निकल जाने पर जल भी मछली को जीवित कर रोक नहीं सकता है । जबकि वह उसका जीवन है । फिर तो वह अन्य क्षुद्र कीटों का ही भोज्य बनती है ।
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मछली मरै न जल थंभै, रहै न नीर समांन ।
जगजीवन काई ना लगै, कोइ इक बाहै बांन ॥९६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मछली के मरने पर भी जल प्रवाह रुकता नहीं है । और निरंतर बहने से उसे कोइ काइ भी नहीं आती जो कि विकार का प्रतिरुप है । यह उसका नियम है कि चाहे जल समान हो या असमान उसे बहना ही है ।
(क्रमशः)

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