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*अपणो जान करै प्रतिपाला,*
*नैन निकट उर धरै गोपाला ॥*
*दादू कहै नहीं वश मेरा,*
*तूँ माता मैं बालक तेरा ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १७७)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*धयौं सु कहा अति मोहि रिझाई हु,*
*रीझ दीये बिन मो उर सालं ।*
*लेहु चह्यो वर साटि१ न चूकत,*
*सूखत है मुख देख विहालं ॥*
*भूप कहै तुम दीन-दयालु,*
*करें कछु नूंन लखो सु विशालं ।*
*देहु यहै वर माँग सिताब२,*
*करो मत पारिख यूं कलि कालं ॥८१॥*
भगवान् बोले – राजन् ! तुमने मुझे अत्यन्त प्रसन्न किया है । मैं तुम्हें क्या दूं? तुम्हारे शिर के समान तो कोई वस्तु है ही नहीं और प्रसन्न होकर दिये बिना मेरे हृदय में व्यथा ही रहती है ।
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तुम चाहो सोई वर माँग लो अपना बदला१ चूको नहीं । तुम्हारे शिर को चीरते समय की अवस्था देखकर मेरा मुख सूख रहा है, इससे अधिक मैं क्या कहूँ ।
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राजा ने कहा – आप तो दीन दयालु हैं, कोई थोड़ा-सा करता है, उसको आप महान् मान लेते हैं । मुझे देना ही चाहते हैं तो यही वर दें । भगवान् बोले शीघ्र२ माँगो । राजा ने माँगा – कलिकाल में भक्तों की इस प्रकार परीक्षा नहीं लेना ।
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मयूरध्वज की भक्ति और उसके पुत्र ताम्रध्वज की वीरता देखकर अर्जुन का गर्व नष्ट हो गया । अर्जुन ने मयूरध्वज को प्रणाम किया । फिर तीन दिन तक मयूरध्वज के घर भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन रहे, चौथे दिन घोड़ा लेकर दोनों चले गये ।
(क्रमशः)

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