गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

*वाणी विचार का अंग १४६(९/१२)*

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*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वाणी विचार का अंग १४६*
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प्राकृत१ पूंजी प्राण पहिं२, संस्कृत सौदे३ लेत ।
रज्जब बांदी बीवियहिं, फिर मुडिहाई देत ॥९॥
साधारण१ बोलचाल की भाषा रूप धन तो प्राणी के पास२ रहता है और संस्कृत भाषा अध्ययन रूप व्यापार३ से प्राप्त की जाती है, फिर भी बीबियों को बांदी मुडिहाई(मात्रा तथा लकीर से रहित लिपि) मे ही पत्रादि देती है ।
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वेद सु वाणी कूप जल, दुख से प्राप्त सु होय ।
शब्द साखि सरवर सलिल, सुख पीवै सब कोय ॥१०॥
वेद वाणी कूप जल के समान है, जैसे कूप जल परिश्रम से मिलता है वैसे ही वेद वाणी अध्ययन के कष्ट से मिलती है और संत वचन साखि सरोवर के जल के समान हैं । जैसे सरोवर जल सुख पूर्वक प्राप्त होता है वैसे ही संत वचन प्राकृत मातृ भाषा में होने से समझने में सुगम होते हैं ।
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विद्या वश वेत्ता बहुत, वाणी वंदि अनेक ।
रज्जब शारद शिर चढै, बावन वर कोई एक ॥११॥
विद्या के वश रहने वाले अर्थात विद्या में ही संलग्न रहने वाले ज्ञानी बहुत हैं, वाणी को नमस्कार करने वाले भी बहुत हैं, किंतु वाणी के शिर चढे अर्थात वाणी के बन्धन से मुक्त हो ऐसा वामन के समान श्रेष्ठ कोई एक ही होता है ।
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वाणी विविध विहार१ करि, सांच वाच२ सौं काम ।
रज्जब राचे३ ताहि गुण, जा में जूना४ राम ॥१२॥
चाहे नाना वाणियों में विचरो१, कार्य तो सत्य वचन२ से ही होगा, अत: जिस वाणी में पुरातन४ राम का यश हो, उसी के गुणों में अनुरुक्त३ होना चाहिये ।
(क्रमशः)

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