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*बाव भरी इस खाल का, झूठा गर्व गुमान ।*
*दादू विनशै देखतां, तिसका क्या अभिमान ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- माता पिता की भक्ति
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अवध देश का नरोत्तम नामक ब्राह्मण माता-पिता का अनादर करके तीर्थ यात्रा करता हुआ तप करने लगा । तप के प्रभाव से उसके वस्त्र भी आकाश में सूखते थे । एक दिन एक बगुले ने उसके मुख पर बीठ कर दी । नरोत्तम ने उसे भस्म कर दिया ।
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इस पाप से आकाश में वस्त्र सुखना बंद हो गया, इससे उसे बङा दु:ख हुआ । फिर आकाशवाणी ने उसे उससे कहा - "तुम मूक चाण्डाल के पास जाओ, वहां तुम्हें धर्म ज्ञान होगा ।"
ब्राह्मण मूक चाण्डाल के घर जाकर बोला - "तुम मेरे पास आओ" मूक- "अभी मैं माता पिता की सेवा में हूँ, इनकी पूजा करके तुम्हारा आतिथ्य सत्कार करूँगा ।" यह सुनकर ब्राह्मण कुपित हो गया ।
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मूक बोला - "क्यों व्यर्थ कोप करते हो, मैं बगुला नहीं हूँ जो भस्म हो जाऊंगा । न तो अब तुम्हारे वस्त्र आकाश में सूखते हैं और न माता पिता के अनादर से तुम्हें सुख है ।"
मां पितु सेवा तज कर, तप सो सुख नहिं पाय ।
विप्र नरोत्तम की कथा, पद्य पुराण सुनाय ॥३६॥

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