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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९१)*
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*९१. (फारसी) हित उपदेश । पंचम ताल*
*बाबा मर्दे मर्दां गोइ, ये दिल पाक कर्दम धोइ ॥टेक॥*
*तर्क दुनियाँ दूर कर दिल, फर्ज फारिग होइ ।*
*पैवस्त परवरदिगार सौं, आकिलां सिर सोइ ॥१॥*
*मनी मुरदः हिर्स फानी, नफ्स रा पामाल ।*
*बदी रा बरतरफ करदः, नाम नेकी ख्याल ॥२॥*
*जिंदगानी मुरदः बाशद, कुंजे कादिर कार ।*
*तालिबां रा हक, हासिल, पासबाने यार ॥३॥*
*मर्दे मर्दां सालिकां सर, आशिकां सुलतान ।*
*हजूरी होशियार दादू, इहै गो मैदान ॥४॥*
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भा० दी०-भक्तियुक्त: शुद्धान्त:करणो निर्मुक्तमाय: शान्तात्मा पुरुष एव सर्वपुरुषश्रेष्ठः । यत: संत्यक्तसंसारसङ्गो वाक्कायमनोभिर्भगवन्तमेव स्मरति सः । स एव मनुष्येषु बुद्धिमान् । स तु कर्तव्यं संपाद्य यो निचलेन चित्तेन विश्वम्भरं परमात्मानमेव स्मरति । किञ्च नश्वरपदार्थानां तृष्णां वासनाञ्च विहाय न दुष्कृतं कर्माचरति । किन्तु परोपकाररतो भवति जीवदवस्थायामेव निर्द्वन्द्वो भवेत् । प्रभुप्राप्त्यर्थ संसारोपरतो जायेत एतादृशैः साधनैरेव जिज्ञासुः सत्यफलमश्नुते । सर्वरक्षकपरमात्मैव सत्सुहृदस्ति । प्रभुप्राप्तिपथपथिकाः सन्त एव भवन्ति । त एव सन्त: प्रभुप्रेमिसाधकानामग्रगण्या मन्यन्ते ।प्रभुसमीपस्था अपि सावहिता भवन्ति । अस्मिन्नेव शरीरे इन्द्रियार्थान् जयन्ति । तानि विजित्य प्रभुसामीप्यमधिगच्छन्ति ।
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पुरुषों में श्रेष्ठ पुरुष वही है जो अपने अन्तःकरण को पवित्र करके शान्त वृत्ति से रहता है । संसार की आसक्ति को त्यागकर मन, वाणी, शरीर से सच्ची भक्ति द्वारा भगवान् का स्मरण करता है । कर्तव्य कर्म कर के निश्चित मन से विश्वम्भर परमात्मा का चिन्तन करता है, मनुष्यों में वह ही बुद्धिमान् है । जो निरहंकारी होता है ।
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नश्वर पदार्थों की तृष्णा और विषय-वासना को त्याग कर दुष्कृत कर्म नहीं करता, किन्तु परोपकार में लगा रहता है । जीवित अवस्था में ही मृतक की तरह निर्द्वन्द्व हो जाता है । प्रभुप्राप्ति के लिये संसार से उपराम रहता है । इन साधनों से ही जिज्ञासु सत्य स्वरूप फल को प्राप्त कर लेता है । सब का रक्षक परमात्मा ही सच्चा मित्र है ।
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संत ही प्रभु प्राप्ति के मार्ग के पथिक हैं । वे ही प्रभु-प्रेमी साधकों में अग्रणी सम्राट् होते हैं । प्रभु के पास रहते हुए भी सदा सावधान रहते हैं । इसी शरीर में इन्द्रियों पर विजय पाई जाती है । इन्द्रियों का जीत कर प्रभु के पास जा सकता है ।
(क्रमशः)
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