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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १०५/१०८*
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हंस बिराजै हेत करि, तहां हरि भगति निवास ।
पिवैं पिलावैं प्रेम रस, सु कहि जगजीवनदास ॥१०५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संत रुपी हंस वहां ही रहते हैं जहाँ प्रभु भक्ति का निवास होता है । वे भक्ति रुपी आनंद रस स्वंय भी पान करते हैं और औरों को भी पिलाते हैं ।
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हंस बिराजै हेत करि, तहँ ही नव निधि नूर ।
कहि जगजीवन अष्ट सिधि, सकल वस्तु६ भरपूर ॥१०६॥
(६. वस्तु=लौकिक पदार्थ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहां संत ज्ञानी रुपी हंस विराजते हैं वहां सारी सृष्टि की निधि या खजाने भरपूर रहते हैं संत कहते हैं कि वहां आठों सिद्धियां भी सभी भौतिक व लौकिक साधनों सहित भरपूर रहती हैं ।
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अंबु परस मुंनि ना करै, अंबुज खुलै न भांन७ ।
कहि जगजीवन आदि घर, यहु चूकै नीसांन८ ॥१०७॥
{७. भांन=भानु(=सूर्य)} {८. नीसां=निशान(लक्ष्य)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जल बिना जैसे मुनि जन कार्यारम्भ नहीं करते कमल बिना सूर्य के अपना विकास नहीं करता यह सब प्रभु के घर की ही लीला है इनमें कोइ भी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता है ।
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तीरथ९, संगति साध की, कथा१०, कीरतन नांम ।
कहि जगजीवन प्रेम रस, भरि भरि पीवै रांम ॥१०८॥
(९. तीरथ=तीर्थयात्रा) {१०. कथा=धार्मिक कथा(धर्मोपदेश)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तीर्थ यात्रा, साधु जन का संग, प्रभु की कथा, भगवान का कीर्तन व स्मरण ये सब प्रभु प्रेम रस के पात्र हैं भक्त इनका पान भर भर कर करते हैं ।
(क्रमशः)
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