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*सतगुरु काढे केस गहि, डूबत इहि संसार ।*
*दादू नाव चढाइ करि, कीये पैली पार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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एक एक तरह के अनार है । एक खास प्रकार हैं, जिसमें थोड़ी देर तो एक तरह की फुलझड़ियाँ होती हैं, फिर कुछ देर बन्द रहकर दूसरे तरह के फूल निकलने लगते हैं, फिर और किसी तरह के फूल, मानो फुलझड़ियों का छूटना बन्द ही नहीं होता ।
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“एक तरह के अनार और हैं । आग लगाने से थोड़ी ही देर के बाद वह भुस्स से फूट जाते हैं । उसी तरह बहुत प्रयत्न करके साधारण आदमी अगर ऊपर चला भी जाता है तो फिर वह लौटकर खबर नहीं देता । जीवकोटि के जो हैं, बहुत प्रयत्न करने पर उन्हें समाधि हो सकती है, परन्तु समाधि के बाद न वे नीचे उतर सकते हैं और न उतरकर खबर ही दे सकते हैं ।
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“एक हैं नित्यसिद्ध की तरह । वे जन्म से ही ईश्वर की चाह रखते हैं, संसार की कोई चीज उन्हें अच्छी नहीं लगती । वेदों में होमापक्षी की कथा है । यह चिड़िया आकाश में बहुत ऊँचे पर रहती हैं । वहीं वह अण्डे भी देती है । इतनी ऊँचाई पर रहती है कि अण्डा बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है । गिरते गिरते अण्डा फूट जाता है । तब बच्चा गिरता रहता है ।
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बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है । गिरते ही गिरते उसकी आँखें भी खुल जाती हैं । जब मिट्टी के समीप पहुँच जाता है, तब उसे ज्ञान होता है । तब वह समझ लेता है कि देह में मिट्टी के छू जाने से ही जान जायगी । तब वह चीख मारकर अपनी माँ की ओर उड़ने लगता है । मिट्टी से मृत्यु होगी, इसीलिए मिट्टी देखकर हुआ है । अब अपनी माँ को चाहता है । माँ उस ऊँचे आकाश में है । उसी ओर बेतहाशा उड़ने लगता है, फिर दूसरी ओर दृष्टि नहीं जाती ।
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"अवतारों के साथ जो आते हैं, वे नित्यसिद्ध होते हैं, कोई अन्तिम जन्मवाले होते हैं ।
(विजय से) “तुम लोगों को दोनों ही है, योग भी है और भोग भी । जनक राजा को योग भी था और भोग भी था । इसीलिए उन्हें लोग राजर्षि कहते हैं । राजा और ऋषि दोनों ही । नारद देवर्षि हैं, और शुकदेव ब्रह्मर्षि ।
“शुकदेव ब्रह्मर्षि हैं, शुकदेव ज्ञानी नही, पुञ्जीकृत ज्ञान की मूर्ति हैं । ज्ञानी किसे कहते हैं ? जिसे प्रयत्न करके ज्ञान हुआ है । शुकदेव ज्ञान की मूर्ति हैं, अर्थात् ज्ञान की जमायी हुई राशि है । यह ऐसे ही हुआ है, साधना करके नहीं ।”
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बातें कहते हुए श्रीरामकृष्ण की साधारण दशा हो गयी है । अब भक्तों से बातचीत कर सकेंगे ।
केदार से उन्होंने संगीत गाने के लिए कहा । केदार गा रहे हैं । उन्होंने कई गाने गाये । एक का भाव नीचे दिया जाता है –
“देह में गौरांग के प्रेम की तरंगें लग रही हैं । उनकी हिलोरों में दुष्टों की दुष्टता बह जाती है । यह ब्रह्माण्ड तलातल को पहुँच जाता है । जी में आता है, डुबकर नीचे बैठा रहूँ परन्तु वहाँ भी गौरांग-प्रेम-रूपी घड़ियाल से जी नहीं बचता, वह निगल जाता है । ऐसा सहानुभूतिपूर्ण और कौन है, जो हाथ पकड़कर खींच ले जाय ?"
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गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण फिर भक्तों से बातचीत कर रहे हैं । श्रीयुत केशव सेन के भतीजे नन्दलाल वहाँ मौजूद थे । वे अपने दो-एक ब्राह्मभक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण के पास ही बैठे हुए हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (विजय आदि भक्तों से) - कारण(शराब) की बोतल एक आदमी ले आया था, मैं छूने गया, पर मुझसे छुई न गयी ।
विजय – अहा !
श्रीरामकृष्ण - सहजानन्द के होने पर यों ही नशा हो जाता है । शराब पीनी नहीं पड़ती । माँ का चरणामृत देखकर मुझे नशा हो जाता है, ठीक उतना जितना पाँच बोतल शराब पीने से होता है ।
(क्रमशः)
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