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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार ।*
*सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥*
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*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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सहकामी दीपक दशा, पाये तेल उजास ।
रज्जब हीरा संतजन, सहज सदा प्रकाश ॥५॥
सकामी की अवस्था दीपक के समान है । जैसे दीपक तेल को प्राप्त करके ही प्रकाश करता है, वैसे ही सकामी प्राणी कामना प्राप्त होने से ही प्रसन्न होता है, निष्कामी संत जन हीरा के समान है । जैसे हीरा स्वाभाविक सदा प्रकाश देता है, वैसे ही संत जन सदा ज्ञान प्रकाश प्रदान करते ही हैं ।
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सहकामी फल ले फिरै, मिलै न सांई मांहिं ।
रज्जब रीझे राम बिन, सो सेवक कछु नाँहिं ॥६॥
सकामी फलाशा लेकर संसार में ही भ्रमण करते हैं, ब्रह्म में नहीं मिल सकते । जो राम के बिना अन्य में अनुरक्त होता है, वह सेवक कुछ नहीं है ।
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चौरासी लख जीव की, चरण शरण तल चाहि१ ।
रज्जब अधर२ अकाश३ रुख४, ऊंची अगम अचाहि५ ॥७॥
आशा१ वाले की स्थिति चौरासी लाख जीवों के चरण तल की शरण में रहती है अर्थात वह सब के पेरों के नीचे रहता है । आशा रहित५ की इच्छा४ सबसे ऊंची उठकर माया रहित२ अगम ब्रह्म३ को प्राप्त करने की होती है ।
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तब लग चेरा१ लच्छि का, चाह तले ह्वै चित ।
रज्जब रही गुलाम२ गति३, होत अचाही नित्त ॥८॥
जब तक चित्त भोगासा के नीचे है, तब तक लक्ष्मी का ही दास१ है और जब सदा के लिये भोगासा रहित हो जाता है तब गुलाम की चेष्टा२ पीछे रह जाती है अर्थात फिर वह माया का दास३ नहीं हो सकता ।
(क्रमशः)
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