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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ ११७/१२०*
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जगजीवन मीठा सबद, मीठा माँहै रांम ।
सोई मीठा हरि भगत, जे मीठा सुमिरै रांम ॥११७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम नाम शबद ही मीठा है और यह मिठास राम नाम की है । जो इसका स्मरण करते हैं वे हरि भक्त भी मधुर हैं ।
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जगजीवन मीठी कथा, मिसरी७ कीरतन सार ।
मीठी रसनां कथित८ गुण, मीठा करत बिचार ॥११८॥
{७. मिसरी=मिश्री(मधुर)} (८. कथित=धर्मकथा में कहे गये )
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु की कथा मधुर है और संकीर्तन सार मिश्री है । धर्म कथा और भी मीठी है जो प्रभु के गुण कहती है । ये सब विचार भी मीठे हैं ।
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जगजीवन मीठी भगति, मीठा हरि का नांम ।
मीठी संगति साध की, जासौं परसैं रांम ॥११९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भक्ति मीठी है प्रभु का नाम मीठा है साधु जन की संगति मीठी है जिसे राम जी का सानिध्य मिलता है ।
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जगजीवन बैकुंठ९ है, जहां कथा कीरतन नांम ।
तेतीस कोटि मुनि लीन रहैं, द्रवैं दया करि रांम ॥१२०॥
(९. बैकुंठ=विष्णु लोक)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ स्मरण कीर्तन है वहाँ ही बैकुंठ है । तैंतीस करोड़ मुनि जन वहां रमण करते हैं प्रभु भक्ति में लीन रहते हैं ।तब प्रभु दया कर द्रवित होते हैं ।
(क्रमशः)

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