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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १३७/१४०*
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मेघ स्त्रवैं४ सलिता५ बहैं, बिरख६ फलैं बहु भांति ।
कहि जगजीवन कौन क्रित, परमारथ दिन राति ॥१३७॥
(४. मेघ स्त्रवैं=बादलों से जल बरसता है) {५. सलिता=सरिता(=नदी)}
(६. बिरख-नाना प्रकार के वृक्ष)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बादलों के बरसने से नदी बहती है । बहुत प्रकार के वृक्ष फलित होते हैं प्रभु यह सब परमार्थ भाव से करते हैं । संत कहते हैं यह ही प्रभु की प्रभुता है ।
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अैसैं उत्तिम सजन जन, देह धारी जग आइ ।
कहि जगजीवन जीव सब, सुख७ कीये रस पाइ ॥१३८॥
(७. सुख=सुखमय सत्कर्म)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सज्जन देह धारण कर इस संसार में आकर सभी जीवों को अमृतपान करकर सुखी करते हैं ।
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दरिया८ मांहीं दोइ फल९, हरि दरसन अरु नांम ।
जगजीवन ते पाइये, क्रिपा करै जे रांम ॥१३९॥
(८. दरिया=भवसागर) (९. फल=लाभप्रद कर्म)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भव सागर में प्रभु दर्शन व स्मरण दो ही सत्कर्म है जिन पर प्रभु कृपा करते हैं वे ही इन्हें प्राप्त करते हैं ।
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हरि कौं चिंता साध की, साध चिंतवै नांम ।
कहि जगजीवनदास तहां, प्रेम पिवै रटि रांम ॥१४०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु को सदा साधु जन की चिंता रहती है और साधु जन नाम स्मरण में मगन रहते हैं । वे राम जप कर ही आनंद रस पान करते हैं ।
(क्रमशः)

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