सोमवार, 6 सितंबर 2021

*सेन शर्म राखी हरी*

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*जहँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि ।*
*दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*सेनजी*
*मूल छप्पय -*
*जगत मांहीं यह प्रकट है, सेन शर्म राखी हरी ॥*
*सुणि घर आये संत, भक्त इक बड़ो हजामी ।*
*टहल करी मन लाय, जानके अन्तरयामी ॥*
*लिये रछोड़ी काच, भूप पै प्रभू पधारे ।*
*मरदन कीन्हों तेल, राय बहु भये सुखारे ॥*
*सेन देख नृप शिव भयो, आज मुक्ति मेरी करी ।*
*जगत मांहिं यह प्रकट है, सेन शर्म राखी हरी ॥१६५॥*
जगत में यह प्रकट ही है कि - सेन भक्त की लज्जा हरि ने रखी थी । कैसे रखी थी सो कह रहे हैं - सेन भक्त बघेल खंड के ‘बांधवगढ़’ नामक नगर में रहते थे । इनका जन्म वैशाख कृ. १२ रवि को हुआ था । और वहां के बघेला राजा रामसिंह को सेवा करते थे । किसी ने वीरसिंह का नाम भी दिया है, वीरसिंह रामसिंह के पुत्र थे ।
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बांधवगढ़ में एक दिन कुछ संत पधारे थे । उन्होंने पूछा, यहां कोई भगवद् भक्त है ? किसी ने कहा - यहां सेना नाई बड़ा भक्त है । यह सुनकर संत सेन के घर पधारे । सेन ने संतों को अन्तर्यामी भगवान् का रूप जान के मन लगाकर उनकी अच्छी सेवा की ।
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सेन संतों की भोजनादि सेवा में संलग्न थे । राजा के तेल मर्दन आदि सेवा का समय हो गया था । भगवान् यह सोचकर कि सेन संत सेवा में लगा है तो इसका काम मुझे करना चाहिये । आपने सेन का रूप धारण किया, कंधे पर हजामत बनाने के राछों की पेटी लगाई । हाथ में दर्पण लिया और ठीक समय पर राजा रामसिंह के पास पहुँचे । राजा की तेल मर्दन आदि सब सेवा की । भगवान् के कर स्पर्श से राजा के सब रोग नष्ट हो गये । उसे अति आनन्द का अनुभव हुआ ।
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इधर संतों की सेवा करके शीघ्रता से सेन राजा के पास गये । राजा ने पूछा, कैसे आया ? सेन ने कहा - घर पर संत पधार गये थे उनकी सेवा में देर हो गई । इसके लिये क्षमा कीजिये । यह सुनकर राजा आश्चर्य में पड़ गया । उसे निश्चय हो गया कि वह भगवान् ही पधारे थे । राजा सेनजी का शिष्य बन गया और बोला - आज आपने मेरी मुक्ति कर दी है ।
(क्रमशः)

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