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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*देह रहै संसार में, जीव राम के पास ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥*
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*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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सकल प्राणि स्वारथ वशी, उलझे आशा फंद ।
रज्जब रट रज काटि कर्म, मुक्ता सोइ स्वच्छंद ॥१७॥
सभी प्राणी स्वार्थ के वश में होकर आशा रूप फंदे में फंसे हैं । जो प्रतिक्षण प्रभु नाम का उचारण और चिंतन करता है, वही ज्ञान प्रकाश द्वारा अपने कर्मों को नष्ट करके मुक्त तथा स्वतंत्र होता है ।
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काम कंद पसरै नहीं, सुरति सुन्दरी भूल ।
जन रज्जब रंकार रत, सो आतमा अमूल ॥१८॥
जिसकी वृत्ति रूप बेलि काम रूप जड़ से निकल कर नारी रूप वृक्ष पर भूल से भी नहीं फैलती, अर्थात नारी के आकार नहीं होती और राम मंत्र के बीज "रा" के चिंतन में निरंतर अनुरक्त रहती है वही जीवात्मा अमूल्य अर्थात महान माना जाता है ।
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एक मनारत एक सौं, काढि कामना कंद ।
उर अंजन उलझै नहीं, वह आतम अबंद ॥१९॥
जिसका एकाग्र मन सांसारिक कामनाओं की जड़ काट कर एक ब्रह्म मे ही अनुरक्त रहता है और हृदय माया में नहीं फंसता, वह जीवात्मा बंधन से रहित मुक्त ही माना जाता है ।
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उर औरै आशा नहीं, मिले न माया मन्न ।
रज्जब मुक्ता मांड में, सुलझ्या साधू जन्न ॥२०॥
जिसके हृदय में ब्रह्म विचार से भिन्न और कोई भी आशा नहीं है । मन माया से कभी भी नहीं मिलता अर्थात माया में अनुरक्त नहीं होता, विचार द्वारा संसार बंधन से निकला हुआ हरि भक्त ब्रह्माण्ड में मुक्त ही माना जाता है ।
(क्रमशः)

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