रविवार, 5 सितंबर 2021

*किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*भक्ति वाहली खरी आप अविचल हरि,*
*निर्मलो नाउं रस पान भावे ।*
*सिद्धि नें रिद्धि नें राज रूड़ो नहीं,*
*देव पद माहरे काज न आवे ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद. १७८)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(४) *किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए*
कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण, विजय, नरेन्द्र तथा दूसरे भक्तों ने आसन ग्रहण किया । सब की दृष्टि श्रीरामकृष्ण पर लगी हुई है । सन्ध्या होने में अभी कुछ देर है । श्रीरामकृष्ण भक्तों से बातचीत कर रहे हैं । उनसे कुशल-प्रश्न पूछ रहे हैं । केदार बड़े ही विनीत भाव से हाथ जोड़कर बहुत ही मृदु तथा मधुर शब्दों में श्रीरामकृष्ण से निवेदन कर रहे हैं । पास हैं नरेन्द्र, चुनी, सुरेन्द्र, राम, मास्टर और हरीश ।
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केदार - (श्रीरामकृष्ण से, विनयपूर्वक) - सिर का चक्कर खाना किस तरह अच्छा होगा ?
श्रीरामकृष्ण - (सस्नेह) - ऐसा होता है, मुझे भी हुआ था । थोड़ा थोड़ा बादाम का तेल सिर में लगाकर मालिश कर लिया कीजिये । सुना है, इस तरह यह बीमारी अच्छी हो जाती है ।
केदार - जो आज्ञा ।
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श्रीरामकृष्ण - (चुनी से) - क्यों जी, तुम सब कैसे हो ?
चुनी – जी, इस समय तो सब कुशल है । वृन्दावन में बलराम बाबू और राखाल अच्छी तरह हैं ।
श्रीरामकृष्ण – तुमने इतनी मिठाई क्यों भेज दी ?
चुनी - जी, वृन्दावन से आ रहा हूँ ।
चुनीलाल बलराम के साथ वृन्दावन गये हुए थे और कई महीने तक वहीं ठहरे थे । छुट्टी पूरी हो रही है, इसलिए अब कलकत्ता लौट आये हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - (हरीश से) - तू दो-एक दिन बाद जाना । अभी बीमारी की हालत है, जाने पर वहाँ फिर बीमार पड़ जायगा ।
(नारायण से, सस्नेह) “बैठ, आ मेरे पास आकर बैठ । कल जाना और वहीं खाना भी । (मास्टर की ओर इशारा करके) इनके साथ जाना । (मास्टर से) क्यों जी ?"
मास्टर की इच्छा थी, वे उसी दिन श्रीरामकृष्ण के साथ दक्षिणेश्वर जायँ, अतएव वे सोचने लगे । सुरेन्द्र बड़ी देर तक थे । बीच में एक बार घर गये थे । घर से लौटकर श्रीरामकृष्ण के पास खड़े हुए ।
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सुरेन्द्र कारण(शराब) पीते हैं । पहले नम्बर बहुत बढ़ा-चढ़ा था । सुरेन्द्र की हालत देखकर श्रीरामकृष्ण को चिन्ता हो गयी थी । बिलकुल ही पीना छोड़ देने के लिए नहीं कहा, उन्होंने कहा, “सुरेन्द्र, देखो, जो पीना, श्रीदेवी को निवेदित करके पीना और उतना ही जिससे न पैर लड़खड़ायें और न सिर घूमे । उनकी चिन्ता करते करते फिर तुम्हें पीना बिलकुल ही अच्छा न लगेगा । वे स्वयं कारणानन्ददायिनी हैं । उन्हें पा लेने पर सहजानन्द होता है ।"
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सुरेन्द्र पास खड़े हैं । श्रीरामकृष्ण ने उनकी ओर दृष्टि करके कहा, तुमने कारण पान किया है । यह कहकर ही भाव में तन्मय हो गये ।
शाम हो गयी । कुछ बहिर्मुख होकर श्रीरामकृष्ण माता का नाम लेकर आनन्दपूर्वक गाने लगे । बीच बीच में तालियाँ बजा रहे हैं । स्वर करके कह रहे हैं - "हरि बोल, हरि बोल, हरिमय हरि बोल, हरि हरि हरि बोला ।”
फिर कहने लगे - "राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम ।”
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श्रीरामकृष्ण अब प्रार्थना कर रहे हैं - "ऐ राम ! हे राम ! मैं भजन हीन हूँ, साधन हीन हूँ, ज्ञान हीन हूँ, भक्ति हीन हूँ, क्रिया हीन हूँ, राम शरणागत हूँ । मैं देह-सुख नहीं चाहता । अष्ट सिद्धि तो क्या, शत सिद्धियाँ भी नहीं चाहता । मैं शरणागत हूँ, शरणागत । बस वही करो, जिससे तुम्हारे पादपद्मों में शुद्धा भक्ति हो, और तुम्हारी भुवनमोहिनी माया से मैं मुग्ध न होऊँ । राम ! मैं शरणागत हूँ ।"
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श्रीरामकृष्ण प्रार्थना कर रहे हैं और सब लोग टकटकी लगाये देख रहे हैं । उनका करुणामय स्वर सुनकर भक्त आँसू रोक नहीं सकते । श्रीयुत राम पास आकर खड़े हुए हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (राम के प्रति) - राम, तुम कहाँ थे ?
राम - जी ऊपर था ।
श्रीरामकृष्ण तथा भक्तों की सेवा के लिए राम ऊपर प्रबन्ध करने के लिए गये थे ।
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श्रीरामकृष्ण - (राम से, सहास्य) - ऊपर रहने की अपेक्षा क्या नीचे रहना अच्छा नहीं ? नीची जमीन में ही पानी ठहरता है । ऊँची जमीन से पानी बह जाता है ।
राम - (हँसते हुए)- जी हाँ ।
छत पर पत्तलें पड़ चुकी हैं । श्रीरामकृष्ण और भक्तों को लेकर राम ऊपर गये और उन्हें आनन्द से भोजन कराया । उत्सव हो जाने पर, श्रीरामकृष्ण निरंजन, मास्टर भक्तों को साथ लेकर अधर के यहाँ गये । वहाँ माँ आयी हुई हैं । आज महाष्टमी है । अधर की विशेष प्रार्थना है, श्रीरामकृष्ण उपस्थित रहें, जिससे उनकी पूजा सार्थक हो जाये ।
(क्रमशः)

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