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*दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध ।*
*कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
इस अंग में पाप पुण्य निर्णय संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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पाप पुण्य का मूल१ है, ता में फेर न सार ।
धर्म कर्म करि ऊपजै, रज्जब समझ विचार ॥१॥
पुण्य की जड़१ पाप है । इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं है, यह सार बात है । धर्म कर्म के द्वारा ही उत्पन्न होता है । यह तुम भी विचार द्वारा समझ सकते हो ।
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जे जड़ पैठै जमी में, अँकुर जाय अकाश ।
त्यों पाप पुण्य का मूल है, सुनहु विवेकीदास ॥२॥
यदि जड़ पृथ्वी में नीचे प्रवेश करती है किन्तु अंकुर तो आकाश को ही जाता है । हे विवेकी दास सुन ! वैसे ही पाप नीचे होने पर भी उससे उत्पन्न पुण्य उत्तम ही है इस प्रकार पाप पुण्य की जड़ है ।
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प्रथम पाप के पेड़ परि, स्वारथ सुकृत डाल ।
रज्जब शाखा तो रहै, किये पेड़ प्रतिपाल ॥३॥
पहले पाप रूप वृक्ष के ऊपर स्वार्थ और सुकृत रूप दो डाल आती है । फिर वृक्ष की प्रतिपालना करने पर ही शाखा रहती है । अत: पाप बिना पुण्य नहीं रह सकता ।
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जड़ सींजत तरुवर बधै, पुण्य पुष्ट१ त्यों पाप ।
रज्जब कही विचार करि, विकट बनाई बाप ॥४॥
जड़ को सींचने पर ही वृक्ष बढता है, वैसे ही पाप द्वारा ही पुण्य बढता१ है, यह हमने विचार करके ही कहा है - भजन विचारादि अंतरंग साधन बिना कोई भी पुण्य कार्य करो उसमें पाप होता ही है । परम पिता प्रभु ने पुण्य उत्पन्न करने की रीति विकट ही बनाई है ।
(क्रमशः)

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