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*परम तेज प्रगट भया, तहाँ मन रह्या समाइ ।*
*दादू खेलै पीव सौं, नहीं आवै नहीं जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)श्रीरामकृष्ण की मातृभक्ति । संकीर्तनानन्द*
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भक्तगण कमरे में बैठे हैं । हाजरा बरामदे में ही बैठे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - जानते हो, हाजरा क्या चाहता है ? कुछ रुपया चाहता है, घर में ऋण है, इसीलिए जप और ध्यान करता है, कहता है, ईश्वर रुपये देंगे ।
एक भक्त - क्या वे मनोरथ की पूर्ति नहीं कर सकते ?
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श्रीरामकृष्ण - यह उनकी इच्छा है । परन्तु प्रेमोन्माद के बिना हुए वे सम्पूर्ण भार नहीं लेते । छोटे बच्चे को, देखो न, हाथ पकड़कर भोजन करने के लिए बैठा देते हैं । बूढ़ों को कौन देता है ? उनकी चिन्ता करके जब आदमी खुद अपना भार नहीं ले सकता, तब ईश्वर उसका भार लेते हैं । हाजरा खुद घर की खबर नहीं लेता । हाजरा के लड़के ने रामलाल से कहा है, 'बाबा से आने के लिए कहना । हम लोग उनसे कुछ माँगेंगे नहीं ।' उसकी बातें सुनकर मेरी आँखों में आँसू भर आये ।
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"हाजरा की माँ ने रामलाल से कहा है, 'प्रताप(हाजरा) से एक बार आने के लिए कहना । और अपने चाचा(श्रीरामकृष्ण) से मेरा नाम लेकर कहना जिससे वे उसे आने के लिए कहें ।' मैंने हाजरा से कहा, उसने कुछ ध्यान ही नहीं दिया ।
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"माँ का स्थान कितना ऊँचा है ! चैतन्यदेव ने कितना समझाया था, तब माँ के पास से आ सके थे । शची ने कहा था, 'मैं केशव भारती को काट डालूँगी ।' चैतन्यदेव ने बहुत तरह से समझाया । कहा, 'माँ, तुम्हारी आज्ञा जब तक न होगी, तब तक मैं न जाऊँगा; परन्तु अगर मुझे संसार में रखोगी, तो मेरा शरीर न रह जायगा । और माँ जब तुम मेरी याद करोगी, तभी मैं तुमसे मिलूँगा । मैं पास ही रहा करूँगा । कभी कभी तुमसे मिल जाया करूंगा ।' तब शची ने आज्ञा दी ।
"माँ जब तक थीं, तब तक नारद तपस्या के लिए नहीं निकल सके । माता की सेवा करते थे न ? माता की देह छूट जाने पर वे साधना के लिए निकले थे ।
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"वृन्दावन जाकर फिर वहाँ से मेरी लौटने की इच्छा ही नहीं हुई । गंगा माँ के पास रहने का विचार हुआ । सब ठीक हो गया कि इस ओर मेरा बिस्तरा लगाया जायगा, उस ओर गंगा माँ का । अब कलकत्ता न जाऊँगा । केवट का अन्न और कितने दिन खाऊँ ? तब हृदय ने कहा, नहीं, तुम कलकत्ता चलो । एक ओर वह खींचता था, एक ओर गंगा माँ ।
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मेरी तो रहने की इच्छा अधिक थी; इसी समय माँ की याद आ गयी । बस सब ठाट बदल गया । माँ बुड्ढी हो गयी थीं । सोचा, माँ की चिन्ता करने लगूँगा तो ईश्वर-फीश्वर का भाव सब उड़ जायगा । अतएव माँ के पास ही चलकर रहना चाहिए । वहीं जाकर ईश्वरचिन्ता करूँगा, निश्चिन्त होकर ।
(नरेन्द्र से) “तुम जरा उससे कहो ना । मुझसे उस दिन कहा था कि देश जायेगा, जाकर तीन दिन रहेगा । परन्तु फिर ज्यों का त्यों हो गया ।
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(भक्तों से) “आज घोषपाड़ा-फोसपाड़ा की कैसी सब वाहियात बातें हुई । गोविन्द ! गोविन्द ! गोविन्द ! अब जरा ईश्वर का नाम लो । उड़द की दाल के बाद पायस-लड्डू हो जाय ।”
नरेन्द्र गा रहे हैं ।
"निरंजन पुरातन पुरुष एक हैं, अरे तू पर अपने चित्त को लगा दे । वे आदि-सत्य हैं, वे कारण(माया) के भी कारण हैं । प्राणरूप से वे चराचर में व्याप्त हैं । वे स्वतः प्रकाशित और ज्योतिर्मय हैं । सब के आश्रय हैं । जिसका उन पर विश्वास होता है, वह उनके दर्शन करता है । वे अतीन्द्रिय भूमि में रहते हैं, नित्य और चैतन्यस्वरूप हैं ।” इत्यादि ।
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नरेन्द्र एक गाना और गा रहे हैं । श्रीरामकृष्ण उठकर नाचने लगे । उन्हें घेरकर भक्तगण भी नाच रहे हैं । सब लोग एक साथ कीर्तन गाते हुए नाच रहे हैं । श्रीरामकृष्ण ने भी एक गाना गाया ।
मास्टर ने भी गाया था । श्रीरामकृष्ण को इसकी बड़ी खुशी है । गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण हँसते हुए मास्टर से कह रहे हैं, "अच्छा खोल बजानेवाला होता तो गाना और जमता । ताक्ताक् ता धिना, दाक्, दाक् दा धिना, ये सब बोल बजते !" कीर्तन होते होते शाम हो गयी ।
(क्रमशः)

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