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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १९७/२००*
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भाव निरंतर का ह्रिदै, मांहीं रस का पुंज ।
जगजीवन तहँ गालिये, सहजै ही सब सौंज ॥१९७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ मन में प्रभु का ध्यान हो और सदा अंतर में आनंद रहे वहां सभी अन्य पूजा पाठ हटा दें ।
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भाव निरंतर का ह्रिदै, दूजा भाव न होइ ।
जगजीवन सेवग सुखी, रांम न भूलै तोहि ॥१९८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ निरंतर प्रभु का भाव हो अन्य कोइ नहीं । वहां प्रभु सेवक सदा सुख में रहते हैं उन्हें प्रभु कभी भी भूलते नहीं है सदा उन पर कृपा करते हैं ।
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रांम* भगति दीदार दत्त, बहु वित आवै आथि ।
तौ जगजीवन लीजिये, हरि भजन की हाथि* ॥१९९॥
(*=* यदि किसी साधक के पास रामभक्ति के माहात्म्य से भेट=पूजा के रूप में बहुत अधिक धन सम्पति एकत्र हो जाय तो उस से उस को हरिभजन रूप हाथी ही खरीदना चाहिए । अर्थात् उस धन को वह ऐसे साधनों में लगा दे कि जिन के माध्यम से हरिभक्ति में अधिक वृद्धि हो ॥१९९॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यदि किसी सेवक की भक्ति व ज्ञान से प्रभावित हो भेंट पूजा के माध्यम से यदि प्रचुर धन आये तो उसे इस धन का उपयोग हरि भक्ति को बढाने वाले साधनों में लगा देना चाहिए ।
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मध्यम क्रोध सदा अगनि, उत्तिम नीर तरंग ।
कहि जगजीवन हरि भगत, रांम ह्रिदै रस रंग ॥२००॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि क्रोध के मध्यम भाव में जीव सदा अग्नि में दहता है जो क्रोध के रुप में दिखता है । श्रेष्ठ तो जल तरंग की भांति शांतरुप में बहना ही है जिससे हृदय में राम नाम रस का रंग रहता है ।
(क्रमशः)

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