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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.११३)*
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*११३. गुरुमुख उपदेश (गुजराती) । ललित ताल*
*भाई रे, तेन्हों रूड़ो थाये, जे गुरुमुख मार्ग जाये ॥टेक॥*
*कुसंगति परिहरिये, सत्संगति अणसरिये ॥१॥*
*काम क्रोध नहिं आणें, वाणी ब्रह्म बखाणें ॥२॥*
*बिषिया तैं मन वारै, ते आपणपो तारै ॥३॥*
*विष मूकी अमृत लीधो, दादू रूड़ो कीधो ॥४॥*
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भा० दी०-यो गुरोराज्ञामनुसरन् साधनान्याचरति । स एव श्रेष्ठः साधक: श्रेयो भाजनं भवति । अत: कुसङ्गं विहाय सत्सङ्गो विधेय: । निवृत्तकामक्रोधादिदुर्भाव: सन् त्वं ब्रह्मविचारं कुरु । विषयेभ्य: स्वमनो दूरीकृत्यात्मानं संसारात्समुद्धर । अहो विषयविषं परित्यज्य नामामृतं त्वं पिबसीत्येवं त्वया साधुकृतम् ।
उक्तं हि विवेकचूडा-
विषयाख्यग्रहो येन सुविरक्त्यसिना हतः ।
स गच्छति भवाम्भोधे: पारं प्रत्यूहवर्जितः ॥
विषमविषयमार्गर्गच्छतोऽनच्छबुद्धे प्रतिपदमभियातो मृत्युरप्येष विद्धि हितसुजनगुरूक्त्या गच्छत: स्वस्य युक्त्या
प्रभवति फलसिद्धि सत्यमित्येव विद्धि यथा ॥
मोक्षस्य काङ्क्षा यदि वै तवास्ति त्यजातिदूराद् विषयान् विषं
पीयूषवत्तोषदयाक्षमार्जव- प्रशान्तिदान्तीर्भज नित्यमादरात् ॥
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जो गुरु की आज्ञा के अनुसार साधनों का पालन करता है, उस साधक का अवश्य कल्याण होता है । अतः कुसंग को त्याग कर सत्संग करो । काम, क्रोध को मिटा का हृदय में ब्रह्म का विचार करो । विषयों से अपने मन को दूर करके अपना उद्धार कर लो । आपने यह काम अच्छा किया कि जो विषयों को छोड़ कर नाम रूपी अमृत का पान कर रहे हो ।
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विवेकचूडामणि –
जिसने वैराग्य रूपी तलवार से विषयों की इच्छा रूपी ग्राह को मार दिया, वह निर्विघ्न संसार-समुद्र से पार हो जायेगा । विषय रूपी विषम मार्ग में चलने वाले मलिन बुद्धि वाले को पग-पग पर मृत्यु आती है और जो हितैषी सज्जन गुरु के कथनानुसार अपनी युक्ति से चलता है, वह अवश्य फलसिद्धि को प्राप्त होता है । यदि तुझे मोक्ष की इच्छा है तो विषयों को विष के समान दूर से ही त्याग दे और संतोष, दया, क्षमा, सरलता, शम, दम, इनका अमृत के समान नित्य आदर पूर्वक सेवन करो ।
(क्रमशः)

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