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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०२)*
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*१०२. विनती । राज विद्याधर ताल*
*दयाल अपनै चरणनि मेरा चित्त लगावहु,*
*नीकैं ही करी ॥टेक॥*
*नखशिख सुरति सरीर,*
*तूँ नांव रहौं भरी ॥१॥*
*मैं अजाण मतिहीण,*
*जम की पाश तैं रहत हूँ डरी ॥२॥*
*सबै दोष दादू के दूर कर,*
*तुम ही रहो हरी ॥३॥*
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भा० दी०-हे दयालो परमात्मन् ! मदीयं मनस्त्वदीयचरणकमलयो: सततं रमताम्, एता-दृशीं कृपां विधेहि । नखशिखपर्यन्तं ममास्मिन्नेव शरीरे तव नाम व्याप्नोतु । हृदयमपि तव नामाङ्कितं भवतु । कीदृग् साधनप्रियो भवानिति नाहं जाने । चित्तमपि परमार्थविमुखमस्ति । यमयातनाभीत्या भीतोऽहमस्मि । अतो मे सर्वान् दोषानपनयेत्यर्थमहं प्रार्थये । उक्तंहि दीनबन्ध्वष्टके- यस्यामि -पङ्कजमुन्निद्रमुनीन्द्रवृन्दै-राराध्यते भवदवानलदाहशान्त्यै । सर्वापराधमविचिन्त्य ममाखिलात्मा,दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ।
भवान्यष्टके-
कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धि कुदास: कुलाचारहीन: कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाऽहं गतिस्त्वं गतिस्त्वमेका भवानि ॥
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हे दयालु परमात्मन् ! ऐसा कृपा कीजिये, जिससे मेरा मन आपके चरण-कमलों में ही सदा लगा रहे । नख से शिखा पर्यन्त मेरे सारे शरीर में आप का नाम ही विराजे । मेरा हृदय भी आपके नाम से सदा प्रेम करे । मैं यह नहीं जानता हूं की आपको कौनसा साधन प्रिय है क्योंकि मैं तो परमार्थ से भ्रष्ट हूं । यमराज के भय से सदा भयभीत रहता हूं । अतः मेरे सारे दोषों को दूर करके मेरे हृदय में बस जावो, ऐसी मेरी प्रार्थना है ।
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दीनबन्धुअष्टक में –
आलस्य रहित होकर मुनिवरों का समूह संसार के दुःख रूपी दावानल की जलन को शान्त करने के लिये जिन भगवान् के चरण-कमलों की आराधना करते हैं, वे समस्त जगत् के आत्मभूत दीनबन्धु मेरे सब अपराधों को भूलकर आज मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट होकर दर्शन दें ।
भवानीअष्टक में –
मैं कुकर्मी, कुसंग करने वाला, दुर्बुद्धि, दुष्ट दास, कुलोचित आचार से रहित, दुराचरण परायण, बुरी दृष्टि वाला तथा खोटे वचन बोलने वाला हूं । फिर भी हे भवानि ! मुझ अधम के तो आप ही रक्षक हैं ।
(क्रमशः)

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