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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १४९/१५२*
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रांम नांम निज ले रहै, कहै सुणैं हरि नाम ।
जगजीवन जे रत भये, सोइ लहैं निज ठांम ॥१४९॥
संतजगजीवन कहते हैं कि जो प्रभु का स्मरण कर प्रभु का ही गुणानुवाद सुनते हैं । जो उसी में रत रहते हैं वे ही प्रभु चरणों में स्थान पाते हैं ।
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रांम नांम निज लै रहै, साधन का मत एह ।
कहि जगजीवन हरि भगत, सो नित देह बिदेह ॥१५०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु स्मरण करते हैं संत कहते हैं कि वे जन इस देह में ही विदेह हैं, भक्ति प्राप्त कर प्रभु स्वरूप हैं ।
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कहि जगजीवन साध सब, साकत७ नांहीं कोइ ।
रसनां नांम न ऊचरै, साकत कहिये सोइ ॥१५१॥
{७. साकत=नास्तिक(राम भजन न करने वाला)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी साधक हैं कोइ भी नास्तिक नहीं है जो कभी भी प्रभु का नाम न ले वह ही नास्तिक है ।
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कहि जगजीवन वैष्णौं८, बसि करि राखै देह ।
प्यावै पीवै प्रेम रस, साधन सबद९ सनेह ॥१५२॥
(८. वैष्णौं=विष्णु का भक्त) (९. साधन सबद=सन्तों के उपदेश)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वे ही वैष्णव जन हैं । नारायण भक्त हैं । जो अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं । वे प्रेम रस पीते और पिलाते हैं और उनकी साधना स्मरण ही है । संतों के उपदेश ही है ।
(क्रमशः)

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