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*ज्यों रचिया त्यों होइगा, काहे को सिर लेह ।*
*साहिब ऊपरि राखिये, देख तमाशा येह ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ९४ ~ मातृभाव से साधना*
*(१)ईश्वर-कोटि का विश्वास स्वयंसिद्ध*
आज नवमी पूजा है, २९ सितम्बर, १८८४ । अभी सबेरा हुआ ही है । काली की मंगलारती हो गयी है । नौबतखाने से रोशनचौकी में प्रभाती मधुर रागिनी बज रही है । ब्राह्मण देव हाथ में फूलदानी लेकर पूजार्थ फूल तोड़ने आ रहे हैं । उधर माली भी देवमन्दिरों में फूल चढ़ाने के उद्देश्य से पुष्पचयन करने निकले हैं । माता की पूजा होगी । श्रीरामकृष्ण उषा की ललाई छा जाने से पहले ही उठे हैं । भवनाथ, निरंजन और मास्टर गत रात्रि से ही यहाँ पर हैं । वे श्रीरामकृष्ण के कमरेवाले बरामदे में रात भर सोये थे ।
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आँख खोलकर देखा, श्रीरामकृष्ण मतवाले होकर नृत्य कर रहे हैं और 'जय दुर्गा, जय दुर्गा' कह रहे हैं ।
जैसे एक बालक, जिसके कमर में धोती भी नहीं रहती, माता का नाम लेते हुए कमरे भर में नाच रहे हैं ।
कुछ देर बाद फिर कह रहे है - 'सहजानन्द - सहजानन्द ।' इसके अनन्तर बार बार गोविन्द का नाम लेने लगे । कह रहे हैं - 'प्राण हे गोविन्द ! मेरे जीवन हो ।'
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भक्तगण उठकर बैठ गये । एकदृष्टि से श्रीरामकृष्ण का भाव देख रहे हैं । हाजरा कालीमन्दिर में हैं । श्रीरामकृष्ण के कमरे के दक्षिण पूर्ववाले बरामदे में उनका आसन है । लाटू भी हैं और श्रीरामकृष्ण की सेवा किया करते हैं । राखाल इस समय वृन्दावन में हैं । नरेन्द्र कभी कभी दर्शन करने के लिए आते हैं । आज आयेंगे ।
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श्रीरामकृष्ण के कमरे के उत्तर-पूर्ववाले छोटे बरामदे में भक्तगण सोये हुए हैं । जाड़े का समय है, इसलिए टट्टी बँधी है । सब के हाथमुँह धो चुकने के बाद, इस उत्तरवाले बरामदे में श्रीरामकृष्ण एक चटाई पर आकर बैठे । दूसरे भक्त भी यहाँ कभी कभी आकर बैठते हैं ।
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श्रीरामकृष्ण – (भवनाथ से) - बात यह है कि जो जीवकोटि के हैं उन्हें सहज ही विश्वास नहीं होता । ईश्वर-कोटि के जो हैं उनका विश्वास स्वतः सिद्ध है । प्रह्लाद 'क' लिखते हुए ही फूट-फूटकर रोने लगे थे । उन्हें कृष्ण की याद आ गयी थी । जीव का स्वभाव है कि उसकी बुद्धि संशयात्मक होती है ।
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वे कहते हैं 'हाँ यह सच तो है, परन्तु – ’ 'हाजरा किसी तरह भी विश्वास नहीं करना चाहता कि ब्रह्म और शक्ति, शक्ति और शक्तिमान दोनों अभेद हैं । जब वे निष्क्रिय हैं, तब उन्हें हम ब्रह्म कहते हैं और जब सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते हैं, तब उन्हीं को शक्ति कहते हैं । हैं वे एक ही वस्तु – अभेद । अग्नि कहने के साथ ही दाहिका शक्ति का बोध हो जाता है और दाहिका शक्ति के कहने पर आग की याद आती है । एक को छोड़कर दूसरे को सोचने की गुंजाइश नहीं है ।
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“तब मैने प्रार्थना की, 'माँ, हाजरा यहाँ का मत उलट देना चाहता है । या तो तू समझा दे या उसे यहाँ से हटा दो ।' उसके दूसरे दिन उसने आकर कहा, हाँ मानता हूँ । तब उसने कहा, विभु सब जगह हैं ।"
भवनाथ - (हँसकर) - हाजरा की इसी बात पर आपको इतना दुःख हुआ था ?
(क्रमशः)

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