सोमवार, 6 सितंबर 2021

*सकाम निष्काम का अंग १५९(२१/२४)*

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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार ।*
*अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥*
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*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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ब्रह्म भजै माया तजै, मन मांही निष्काम ।
जन रज्जब ता संत सौं, प्रत्यक्ष रीझैं राम ॥२१॥
जो मन से माया को त्याग कर तथा मन में निष्काम भाव रखकर निरंतर ब्रह्म का भजन करता है, उस से रामजी प्रसन्न होकर उसके हृदय में प्रगट होते हैं ।
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निष्कामी सेवा करै, ज्यौं धरती आकाश ।
चंद सूर पाणी पवन, त्यों रज्जब निज दास१ ॥२२॥
जैसे पृथ्वी आकाश चन्द्र सूर्य जल वायु ये निष्कामी होकर विश्व रूप प्रभु की सेवा करते हैं, वैसे ही भगवान के निज भक्त१ निष्काम भाव से ही भक्ति करते हैं ।
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नारायण जाचै१ नहीं, सुरपति माँगै कब्ब२ ।
रज्जब राते३ इस मतै४, निरिहाई५ सो सब्ब६ ॥२३॥
जब नारायण भगवान से ही नहीं मांगते१ तब इन्द्र से तो कब२ मांग सकते हैं ? जो इच्छारहित५ हैं सो सभी६ इस निष्कामता के सिद्धान्त में ही अनुरक्त३ हैं ।
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रज्जब रिधि सिधि ना रुचै, जा जिव में जगदीश ।
निरिहाई१ निष्काम सो, मन वच विसवाबीस२ ॥२४॥
जिस जीव के हृदय में निरंतर जगदीश्वर का चिन्तन होता है, उसे ॠद्धि सिद्धि रुचिकर नहीं होती वह इच्छा रहित१ व्यक्ति ही मन वचन कर्म से निश्चय२ ही निष्कामी होता है ।
(क्रमशः)

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