बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१२१

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१२१)*
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*१२१. (सिंधी)विरह विलाप । मल्लिका मोद ताल*
*हाल असां जो लालड़े, तो के सब मालूमड़े ॥टेक॥*
*मंझे खामा मंझि बराला, मंझे लागी भाहिड़े ।*
*मंझे मेड़ी मुच थईला, कै दरि करियां धाहड़े ॥१॥*
*विरह कसाई मुं गरेला, मंझे बढ़े माइहड़े ।*
*सीखों करे कवाब जीला, इयें दादू जो ह्याहड़े ॥२॥*
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भा० दी०-मदीयां विरहव्यथाजन्यां दशां त्वं जानास्येव सर्वज्ञत्वात् । विरहाग्निरपि मां दहति । हृदयस्थं विरहाग्नि दर्शनदानामृतप्रवाहेन शमय । त्ववियोगेनैव जनितोऽयं विरहाग्निः । यावद्धि तव ममैक्यं न स्यासावदयं न शान्तिमेष्यति । त्वां विहाय कस्यान्यस्य द्वारि गच्छाम्यहम् । यतस्त्वत्प्राप्त्यर्थमन्यस्य समक्षं स्थातुमपि नेच्छामि कुत: प्रार्थयितुम् । हे मातृवत्परमेश्वर ! प्राणाघात-कोऽयं विरहो मम हृदये मदीयं सुखशान्तिरूपमाश्रयं विरहशस्त्रेण छिनत्ति । यथा शलाकया श्लिष्टमांसखण्डोऽग्नौ पच्यते तद्वदेव मे हृदयं विरहेण दह्यते । अत्र जलसेचनेनाग्ने- स्तापातिशयो ध्वन्यते । अलौकिकचार्य विरहाग्निः । अलौकिकेनैव त्वदर्शनदानेन शान्तिमेष्यति । अन्यथा स्वयं दहन् अन्यानि शरीराण्यपि ज्वालयिष्यति । तथा सति जीवनमेव मे नक्ष्यति ।
उक्तं श्रीमद्भागवते रासपंचाध्याय्याम्-
तन्नः प्रसीद वृजिनार्दन तेऽधिमूलं प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशा: ।
त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीब्रकाम- तप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ॥
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हे स्वामिन् ! मेरी इस विरह-व्यथा जन्य दशा को आप सर्वज्ञ होने के कारण अच्छी तरह से जान रहे हो और यह विरहाग्नि मुझे जला रही है । इस हृदय में जलने वाली विरहाग्नि को दर्शन-दान रूपी अमृतजल के प्रवाह से शान्त करें क्योंकि इस विरहाग्नि को आपने ही पैदा किया है ।
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जब तक आपकी और मेरी एकता रूपी मिलन नहीं हो जायगा, तब तक मुझे शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती । आपको छोड़ कर किसी दूसरे के द्वार पर कैसे प्रार्थना करूं क्योंकि मैं तो दूसरे के सामने खड़ा भी नहीं हो सकता, फिर प्रार्थना की तो बात ही कैसे हो सकती है ?
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हे मेरे मातृतुल्य परमेश्वर ! यह प्राणियों को मारने वाला विरह कसाई निर्दयी है वह मेरे हृदय में सुख शान्ति रूप कण्ठ है उसको विरह-शस्त्र से काट रहा है । जैसे लोहे की शलाका के अग्रभाग में मांस का टुकड़ा लगा कर अग्नि में पकाया जाता है, उसी तरह यह विरह मेरे हृदय को जला रहा है ।
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यहां पर दर्शनामृतजल के प्रवाह से सिंचन बतलाया है, उससे अतिशय विरहाग्नि ध्वनित होती है । यह अग्नि अलौकिक है, अतः अलौकिक दर्शन-दानामृत जल के सिंचन से ही शान्त हो सकती है अन्यथा वह स्वयं जलती हुई शरीर तथा सभी अंगों को जला डालेगी । ऐसा होने पर मेरा जीव नहीं रहेगा ।
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श्रीमद्भागवत् में रासपंचाध्यायी में लिखा है कि –
हे श्याम सुन्दर ! आप पापों को नष्ट करने वाले हैं, अतः हमारे काम-शत्रु को, जिसने हमारी आत्मा को संतप्त कर रखा है, नष्ट कर दें और हमारे पर आप प्रसन्न हो जाइये । क्योंकि हम आपके चरणों की उपासना के लिये गृहस्थ आश्रम को त्याग कर चरणों की शरण में आई हैं ।
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आप की सुन्दर मन्द-मन्द मुस्कान को देखने से तीव्र काम उत्पन्न हो कर हमारे अन्तःकरण को संतप्त कर रहा है । आप पुरुषों में अनन्त-कोटि कन्दर्प की सुन्दरता से भी अधिक सुन्दर पुरुष-भूषण हैं । कृपा करके अपनी दासता को दीजिये ।
(क्रमशः)

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