बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ३७/४०*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ३७/४०*
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सत प्रधान समाधि हरि, रांम ह्रिदै प्रकास ।
बाइसवृति१ तजि नांम भजि, सु कही जगजीवनदास ॥३७॥
(१. वाइसवृति=काक(वायस) के समान मलिन चेष्टाएँ । सत्त्वगुणयुक्त समाधि द्वारा हरिभजन करने से ही प्रभु के दर्शन होते हैं)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सत्य प्रधान रखते हुये समाधि में मन में हरि का ध्यान करें । व काक चेष्टा त्याग कर स्मरण करें जिससे ज्ञान का प्रकाश हो ।
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ब्रह्म निवास प्रकास हरि, रांम ह्रिदा मंहि बास ।
ते हरि हंसा२ हैं प्रसिध, सु कही जगजीवनदास ॥३८॥
(२. हंसा=विशिष्ट सन्त)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु निवास में नाम प्रकाश हो, व हृदय में प्रभु का वास हो ऐसे हरिभक्त संत हंस के समान प्रसिद्ध हैं ।
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मूंनि३ मगन, हरि सुभ वचन, सुमिरन मांहि समाइ ।
कहि जगजीवन आप के, इहि विधि प्रांण कमाइ४ ॥३९॥
(३. मूंनि=मौन व्रत) (४. प्रांण कमांइ=जीवात्मा स्वयं को कसौटी पर कसे)
जो मौन में मग्न रहे शुभ वचन बोले और स्मरण में रत रहे । जीवात्मा की यह ही कसौटी है या उसकी नाम कमाई का मापन है ।
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मूंन रतन हरि रांमधन, जे कोई जांणै राखि ।
कहि जगजीवन संत सिरोमनि, सतगुरु बोलैं साखि ॥४०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मौन रत्न जैसा है, अगर कोइ अपनाये तो । ऐसा संत शिरोमणि अपनी साखी में कहते हैं ।
(क्रमशः)

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