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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१२२)*
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*१२२. विनती । मल्लिका मोद ताल*
*पीवजी सेती नेह नवेला,*
*अति मीठा मोहि भावे रे ।*
*निशदिन देखौं बाट तुम्हारी,*
*कब मेरे घर आवे रे ॥टेक॥*
*आइ बनी है साहिब सेती,*
*तिस बिन तिल क्यों जावे रे ।*
*दासी कों दर्शन हरि दीजे,*
*अब क्यौं आप छिपावे रे ॥१॥*
*तिल तिल देखूं साहिब मेरा,*
*त्यों त्यों आनन्द अंग न मावे रे ।*
*दादू ऊपर दया मया करि,*
*कब नैनहुँ नैन मिलावे रे ॥२॥*
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भा० दी–प्रियवियोगयुक्तो भक्तो भगवन्तं प्रार्थयते-
हे प्रभो ! मदीयं प्रेमाऽपि नित्यं नूतनायते । भवानपि मधुरः प्रियोऽस्ति मे । अहर्निशं तवागमनमार्ग पश्यामि कदागत्य मामनुग्रहिस्यसि । प्रतिदिनं त्वां चिन्तयन् दुःखितोऽस्मि । अधुना तु त्वमीदृशप्रीतिविषयो जातोऽसि यत्क्षणमपि त्वां विना मे जीवनं कथं व्यत्येस्यते । हे प्रेभो ! तव दासाय दर्शनं देहि । आत्मानं व्यर्थं मा गोपाय त्वम् । नहि त्वं गुप्त: स्थाष्यसि । यदा तव दर्शनं स्यात् तदा प्रियेक्षणेनोत्फुल्लनेत्रोऽहं प्रेमानन्दरसे निमक्ष्यामि । अहो तदा कियानान्द आविर्भविष्यतीति न वक्तुं शक्नुयामः । तदा त्वहं पूर्णमनोरथ: सन् स्नेहासिक्तो भविष्यामि । हे प्रभो! मम नयनान्तरे निवस, येन विरहो न भवेत् । स्नेहस्यैतदेवपूर्णत्वं यदुत्तरोत्तरं भृशायते ।
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अपने प्यारे के वियोग में दुःखित हुआ भक्त भगवान् से प्रार्थना कर रहा है कि – हे भगवान् ! मेरा प्रेम आपसे नित्य नूतन होता जा रहा है । आप भी मुझे मधुर प्रिय लगते हैं । रात-दिन आपके आने का मार्ग देख रहा हूं कि भगवान् मेरे घर कब पधारेंगे ? कहिये, अब मेरे मन्दिर को आप अपने आगमन से कब सुशोभित करेंगे ? मैं प्रतिदिन विचार-विचार कर दुःखी रहता हूं ।
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अब तो मेरा प्रेम इतना बढ गया है कि आपके बिना क्षण भर भी व्यतीत होना कठिन हो गया है । हे प्रभो ! इस दास को दर्शन दीजिये । आप अपने को क्यों छिपा रहे हैं । आप गुप्त नहीं रह सकोगे । जब मुझे आपके दर्शन होंगे, तब मेरे नेत्र आपके प्रिय दर्शनों से खिल जायेंगे और मैं प्रेमानन्द में डूब जाऊंगा ।
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अहो ! क्या कहूं ? उस समय कितना आनन्द आएगा कि मैं पूर्ण मनोरथ होकर स्नेह के समुद्र में डूब जाऊंगा । हे प्रभो ! आप मेरे नेत्रों में ही बस जाइये, जिससे फिर विरह न हो सके । प्रतिदिन प्रेम-रस के बढने में ही स्नेह का पर्यवसान माना गया है ।
(क्रमशः)

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