शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ४१/४४*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ४१/४४*
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जे कुछ आग्या५ सो सही, बिन आग्या कछु नांहि ।
कहि जगजीवन कहसी सुणसी, ते पुनि आग्या मांहि ॥४१॥
(५. आज्ञा=भगवान् या गुरु का आदेश)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु की आज्ञा हो वह ही सही है । बिन आज्ञा कुछ नहीं होता जीव जो कुछ भी कहते सुनते हैं वह सब प्रभु आज्ञा से से ही होता है ।
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बुरी गमावै६,भली कमावै७, सर सर आग्या७ सोइ८ ।
कहि जगजीवन सीस लेखि९ हरि मेटनहार न कोइ ॥४२॥
(६. बुरी गमांवै=मिथ्या धारणाओं को नष्ट करे) (७. भली कमावै=अच्छी बातें मन में धारण करे) (८. सर सर आग्या सोइ=उसी आदेश का पालन करे) {९. सीस लेखि=कर्म का लिखा(=भाग्य लेख)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो मिथ्या धारणा को नष्ट कर सत्कर्म करें और प्रभु आज्ञा का पालन करें संत कहते हैं कि तकदीर के लेख प्रभु के बिना कोइ नहीं बदल सकता है ।
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निरभै जन निरमल सदा, अलख आग्या बूझि ।
कहि जगजीवन साध कहैं सब, मन सौ मन मंहि झूझि१० ॥४३॥
(१०. मन सौं मन मंहि झूझि=साधना को गुप्त रखने वाला 'सन्त' कहलाता है ।)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जन भय रहित है वे निर्मल हैं और वे प्रभु आज्ञा में रहते हैं । संत कहते हैं वे सब साधना मन में ही रखते हैं । अतः वे ही सच्चे संत हैं ।
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कहि जगजीवन साध कहै, आठ पहर मैं एह ।
रांम रांम हरि रांम हरि, हरि हरि हरि हरि देह ॥४४॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संत आठो पहर राम राम हरि हरि ही सिमरते रहते हैं ।
(क्रमशः)

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