शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

*गुझ लीला रघुवीर की*

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*दादू राम रसाइन नित चवै, हरि है हीरा साथ ।*
*सो धन मेरे साइयां, अलख खजाना हाथ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मानदासजी*
*छप्पय -*
*गुझ लीला रघुवीर की, विदित करी है मानदास ॥*
*शृंगार वीर करुणादि, निर्मल रस कृति मधि आनें ।*
*जनक-सुता वर सुयश, ग्रहो निशि रहि रँग सानें ॥*
*परमारथ सु प्रवीन, काव्य अक्षर धर मानत ।*
*चरणांबुज चित ध्यान, एक ही सम्पत्ति आनत ॥*
*राम चरित हनुमानकृत, रहसि उक्ति धरि करि हुलास ।*
*गुझ लीला रघुवीर की, विदित करी है मानदास ॥१६८॥*
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मानदासजी काव्य के शृंगार, वीर, करुणा आदि निर्मल रस अपनी रचना में लाते थे । जनक पुत्री सीताजी के पति रामचन्द्रजी का सुयश दिन रात गाते हुये उसी में मन को मिलाये रहते थे।
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आप परमार्थ में अति प्रवीण थे। आपकी कविता को अक्षरधर(विद्वान्) भी अच्छी मानते थे। चित्त में एक मात्र रामजी के चरण कमलों का ध्यान और नाम तथा गुणानुवाद को ही संपत्ति के समान धारण करते थे अर्थात् रामजी का ध्यान नाम चिन्तन और गुणानुवाद ही उनका धन था।
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हनुमान् जी के रचित हनुमान् नाटक में रहस्यमय उक्तियाँ थीं उनको अपनी रचना में धर कर आनन्दित हुये थे। इस प्रकार रघुवीर रामचन्द्रकी गुप्त केलि जो हनुमान् नाटक के दूसरे अंक में शय्या विहार वर्णन है, सो मानदासजी ने हिन्दी कविता द्वारा प्रकट किया है।
(क्रमशः)

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