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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ १७/२०*
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एक कहै अरु करै नहीं, सबद बहै ज्यूँ बाइ८ ।
कहै जगजीवन एक करि, रांम कहै सति भाइ ॥१७॥
(८. बाइ=वायु)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो बात कही जाये यदि वह क्रियान्वयन में न आये तो शब्द ऐसे व्यर्थ हो बह जाते हैं जैसे हवा । संत कहते हैं कि एक प्रभु का ध्यान करें राम ही सत्य है ।
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वो जो जिहिं कीनौं जगत, अरु जपि अजपा जाप९ ।
कहि जगजीवन अजनमा, अबिगति आपै आप ॥१८॥
(९. अजपा जाप=सोऽहं मन्त्र का जप)
संत जगजीवन जी परमात्मा का स्वरूप बताते हुये कह रहे है कि वे प्रभु जिन्होंने यह संसार बनाया है और सो अहम् मंत्र जाप की महिमा बतायी है । संत कहते हैं कि वे अजन्मा प्रभु स्वयं ब्रह्म है ।
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कहि जगजीवन जीव रहै, भावै त्यूँ हौ एह ।
पांच१० पचीस११ र तीन१२ रांम रत, हरि कौं सौंपी देह ॥१९॥
(१०. पाँच=पृथ्वी आदि पाँच महाभूत) {११. पचीस=पचीस तत्त्व(सांख्यमत के अनुसार)} (१२. तीन=सत्त्व, रज, तम=ये तीन गुण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पांच तत्व पच्चीस प्रकृति व तीन गुण । सब राम में रत रहे व ये देह हरि को समर्पित करें ।
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रांम अखंडित एक रस, खंडित आंन बिनास ।
हरि भजि हरि मैं मिलि रहै, सु कहि जगजीवनदास ॥२०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम निरंतर है और अन्य सब खण्डित व विनाशवान है । अतःप्रभु स्मरण कर प्रभु की शरण में ही रहो ।
(क्रमशः)

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