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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१२३)*
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*१२३. (गुजराती भाषा) । राज मृगांक ताल*
*पीव घर आवे रे, वेदन मारी जाणी रे ।*
*विरह संताप कौण पर कीजे, कहूँ छूं दुख नी कहाणी रे ॥टेक॥*
*अंतरजामी नाथ मारा, तुज बिण हूँ सीदाणी रे ।*
*मंदिर मारे केम न आवे, रजनी जाइ बिहाणी रे ॥१॥*
*तारी बाट हूँ जोइ थाकी, नैण निखूट्या पाणी रे ।*
*दादू तुज बिण दीन दुखी रे, तूँ साथी रह्यो छे ताणी रे ॥२॥*
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भा० दी०-मदीयां विरहव्यथां विज्ञाय मम हृदयमन्दिरे सत्वरं प्रविश । आगत्य च मम दशामवलोकय । दृष्ट्वा च दर्शनं देहि । हे प्रभो ! स्वविरहदुःखं कस्मै निवेदयेयम् । नान्यं श्रोतारं पश्यामि । अतस्त्वामेव मे विरहगाथां श्रावये । त्वं मम स्वामी अन्तर्यामी चातोऽन्तर्व्यथां सर्वा जानास्येव । अहन्तु त्वां विना महहुःखमनुभविष्यामि । कथं न मन्मन्दिरे हृदयमधितिष्ठसि । ममायुरपि प्रतिक्षणं क्षीयते । त्वदागमनमार्ग चिरं दर्श दर्श श्लथोऽस्मि । त्वां द्रष्टुं रोदं रोदं नयनयोरश्रुजलमपि प्रायो नष्टकल्पम् । त्वदर्शनं विना त्वद्भक्तोऽहमतिदीनो दुःखीभवामि अधुनाऽपि चेत्त्वं दर्शनं न यच्छसि तदा महानन्यायो भवेत्, तत् किमुचितमनुचितं वेति त्वयैव विचार्यताम् । इत्येवं विधा विरहिजनविलापा भवन्ति ।
उक्तंहि-
शोके क्षोभे च हृदयं प्रलापैरवधार्यते ।
पूरोत्पीडे तडागस्य परीवाहः प्रतिक्रिया ॥
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आप मेरी विरह-पीडा को जान कर शीघ्र मेरे घर पर पधारें और दर्शन देवें तथा मेरी दशा को देखें । हे प्रभो ! मैं मेरी व्यथा को किससे कहूं ? कोई दूसरा सुनने वाला ही नहीं है । अतः मैं आप को ही सुना रहा हूं ।
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देखिये आप मेरे स्वामी हैं और अन्तर्यामी हैं, इसलिये मेरी अन्तरव्यथा को जान ही रहे हैं । मैं तो आपके बिना महादुःखी हो रहा हूं । आप मेरे हृदय-मन्दिर में क्यों नहीं आते ? मेरी आयु प्रतिक्षण नष्ट हो रही है ।
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आपके आने के मार्ग को देखते-देखते थक गया हूं, आपके दर्शनों के लिये रोते-रोते आंखों का पानी भी नष्ट हो गया । अब भी आप यदि दर्शन न देंगे तो मेरे साथ यह अन्याय होगा । यह उचित है या अनुचित ? यह आप ही विचारें । इस प्रकार विरही-जन विलाप-प्रलाप करते ही रहते हैं ।
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लिखा है कि –
शोक में, क्षोभ में, हृदय को रो रो कर ही रोका जाता है । जैसे तालाब यदि पानी से भर जाय तो उसके पानी को निकाल देना ही अच्छा है, नहीं तो तालाब फूट कर नष्ट हो जायगा ।
(क्रमशः)

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