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*श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*बाँचत पुस्तक नाम हरै अघ,*
*सत्य सबै सु प्रमाण कही जे ।*
*हो सु प्रतीति कहो तुमही जिमि,*
*खाय नन्दीश्वर पांति हि लीजे ॥*
*भोजन लेकर मन्दिर आवत,*
*भक्त कहै यह न्याय करीजे ।*
*जानत हो तुम नाम प्रताप हि,*
*पाय लियो जय शब्द भनीजे ॥१८१॥*
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तुलसीदासजी ने रामतापनीय आदि श्रुतियों, हारितादि स्मृतियों और श्री मद्भागवतादि पुराणों का संकेत किया था । पंडितों ने उन सभी पुस्तकों को पढ़ा तो ब्रह्महत्यादि मोचनी रामनाम की महिमा लिखी हुई सत्य ही मिली । पंडितों ने कहा - लिखी तो है किन्तु यह सब सत्य है, इसको प्रमाणित करो । तुलसीदासजी ने कहा – आप लोगों को जिस प्रकार भी सम्यक् विश्वास हो वही कहो ।
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पंडितों ने कहा - यदि इसके हाथ का पदार्थ पाषाण का नन्दीश्वर भक्षण करले तो, इसको हम शुद्ध मान कर पंक्ति में ले सकते हैं । तुलसीदासजी ने कहा - बहुत अच्छा । थाल में प्रसाद भर के, उसके हाथों में देकर, समाज के सहित, विश्वनाथ के मंदिर में नन्दीश्वर के पास आये ।
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भक्त तुलसीदासजी ने विनय पूर्वक नन्दीश्वरजी को कहा - आप राम नाम का माहात्म्य जानते हैं । अतः हमारा यह न्याय कर दीजिये । यह व्यक्ति नाम के उच्चारण से पवित्र हो गया है । तब तो आप इसके हाथ का प्रसाद पा लीजिये ।
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नन्दीश्वरजी उसके हाथ का वह सब प्रसाद पा गये । यह देख कर तुलसीदासजी के विश्वास से प्रसन्न हुये सब लोग जय शब्द बोलने लगे । श्रीराम नाम की जय, तुलसीदासजी की प्रीति तथा प्रतीति की जय हो जय हो ।
(क्रमशः)

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