मंगलवार, 2 नवंबर 2021

*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ४५/४८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ४५/४८*
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हरि हरि हरि हरि हेत हरि, हरि हरि हरि हरि प्रीति ।
कहि जगजीवन रांम ह्रिदै हरि, बैठा त्रिभुवन जीति ॥४५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो हरि से स्नेह करते हैं व हरिनाम से ही जिनकी प्रीत है, जिनके ह्रदय में राम, हरि हैं वे ही त्रिभुवन विजेता हैं । वे ही संयमी जन हैं ।
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कहि जगजीवन अखै बड़१, आदि अखय बड़ नांव२ ।
तिरवेणी संगम बिराजै, प्रयाग पवित्र गांव ॥४६॥
(१. अखै बड़=अक्षय वट) (२. बड़ नांव=यही अक्षय वट 'आदि वट' नाम से प्रयाग तीर्थ के त्रिवेणी संगम पर प्रसिद्ध है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अक्षय वट यह जैसे श्रेष्ठ वृक्ष है ऐसा ही प्रभु का नाम है जो अतंर मे इड़ा पिंगला नदी तट पर स्थित हो मन को ही संगम प्रयाग तीर्थ करता है ।
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कहि जगजीवन हंस गति, नीर खीर निरधारि३ ।
पै पीवै नित रांम रस, हरि भजि, परिहरि वारि४ ॥४७॥
{३. निरधारि=निश्चय(विवेक) कर} (४. परिहरि वारि=साधारण जल का त्याग करे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव हंस की भांति नीर व क्षीर अर्थात दूध को पृथक करने वाला हो जो राम नाम रुपी रस पीने वाला हो व संसार के सभी विषय जो कि सामान्य जल जैसे हैं, को त्यागे व क्षीर रुपी रामरस का पान करें ।
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कहि जगजीवन हंस की, चंच५ बिना न बिवेक ।
नीर खीर निरवारि कर, हरिजन राखै एक ॥४८॥
५. चंच=चज्चु(चोंच) ।
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव जब तक विवेक नहीं अपनाता जो कि हंस की उस चौंच के समान है जो क्षीर नीर का निर्णय करती है तब तक वह अच्छे बुरे को समझ नहीं पाता । जब विवेक रुपी चोंच आती है तभी वह अच्छा बुरा जानकर एक परमात्मा का प्रश्रय लेता है ।
(क्रमशः)

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