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*साधू राखै राम को, संसारी माया ।*
*संसारी पल्लव गहै, मूल साधू पाया ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###.
श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥७ दास्य भक्ति॥*
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*॥ दास भक्त के मन में धनादि इच्छा नहीं ॥*
धन आदिक इच्छा न रहे, दास भक्त मन माँहि ।
लेकर भी रैदास ने, पारस बरता नाँहि ॥१७८॥
दृष्टांत कथा – रैदासजी की साधु सेवा से रुष्ट होकर घरवालों ने उन्हें अलग कर दिया था उनकी दरिद्रता को देख कर एक दिन भगवान् साधु के भेष में उनके पास गये । रैदासजी ने उनकी बहुत सेवा की । साधु ने प्रसन्न होकर रैदास को पारस दिया और उसके गुण बतलाकर कहा – 'यत्न से रखना ।' रैदास – 'यह मेरे किसी काम का नहीं, मेरा धन तो राम नाम है ।'
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साधु ने रांपी के लगा कर उसका गुण प्रत्यक्ष भी दिखा दिया । रैदास ने अपने मन में सोचा रांपी भी हाथ से गई । अन्त में साधु के बहुत आग्रह करने पर रैदास ने कहा – 'अच्छा छप्पर में रख दो ।' साधु पारस को छप्पर में रख कर चले गये और तेरह मॉस के बाद फिर आकर रैदासजी की स्थिति पूर्ववत ही देखकर बोले – 'पारस का क्या हुआ ।' रैदास – 'जहां आप रख गये थे वहां ही पड़ा होगा, मुझे तो उसके हाथ लगाने से भी भय होता है ।' साधु रूप भगवान् उसे उठा कर ले गये । इससे सूचित होता है कि दास भक्त के मन में धन आदि की इच्छा नहीं होती ।

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